मूल दस्तावेज के बिना फोटो-कॉपी पर मौजूद विवादित हस्ताक्षर की हस्तलेखन जांच नहीं कराई जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी दस्तावेज की केवल फोटो-कॉपी उपलब्ध है और उसका मूल दस्तावेज पेश नहीं किया गया तो उस पर मौजूद विवादित हस्ताक्षरों की हस्तलेखन विशेषज्ञ से वैज्ञानिक जांच नहीं कराई जा सकती। अदालत ने कहा कि फोटोप्रति में वे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विशेषताएं सुरक्षित नहीं रहतीं, जिनके आधार पर हस्ताक्षरों की विश्वसनीय तुलना संभव होती है।
जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,
"यदि किसी विशेषज्ञ को फोटो-कॉपी पर मौजूद विवादित हस्ताक्षरों की तुलना मूल दस्तावेजों पर उपलब्ध स्वीकृत हस्ताक्षरों से करनी पड़े तो वह उन महत्वपूर्ण संकेतों से वंचित हो जाता है, जिनसे हस्तलेखन की वैज्ञानिक जांच सार्थक होती है। फोटो-कॉपी में धुंधलापन, विकृति, आकार में बदलाव, छाया और लिखावट के दबाव जैसे महत्वपूर्ण गुण समाप्त हो जाते हैं, जिससे विश्वसनीय वैज्ञानिक राय देना संभव नहीं रहता।"
मामला एटा में एक दुकान से बेदखली की कार्यवाही से जुड़ा था। किरायेदार ने अपने बचाव में वर्ष 2005 के किरायानामे की फोटो-कॉपी पेश की और दावा किया कि उसी के आधार पर वह दुकान में किरायेदार के रूप में रह रहा है। उसका कहना था कि मूल किरायानामा मकान मालिक के पास था।
कार्यवाही के दौरान किरायेदार ने मांग की कि फोटो-कॉपी पर मौजूद मकान मालिक के कथित हस्ताक्षरों की तुलना अन्य मूल दस्तावेजों पर उपलब्ध हस्ताक्षरों से कराने के लिए मामले को हस्तलेखन विशेषज्ञ के पास भेजा जाए।
किराया प्राधिकरण ने यह आवेदन खारिज किया। उसका कहना था कि मूल दस्तावेज उपलब्ध न होने पर केवल फोटो-कॉपी के आधार पर कराई गई जांच से कोई उपयोगी निष्कर्ष नहीं निकलेगा। किराया अधिकरण ने भी इस निर्णय को सही माना।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्रतिवादी ने अपने पिता के हस्ताक्षरों को पहचानने की बात स्वीकार की और किराए की प्रारंभिक राशि तथा उसमें वृद्धि के तरीके को भी माना। इसलिए विशेषज्ञ जांच की अनुमति दी जानी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि हस्तलेखन विशेषज्ञ केवल अक्षरों या हस्ताक्षरों का बाहरी स्वरूप नहीं देखता, बल्कि लिखावट की गति, दबाव, स्वाभाविक उतार-चढ़ाव, स्याही का प्रवाह, कलम उठाने के तरीके और अन्य सूक्ष्म विशेषताओं का भी परीक्षण करता है। ये सभी गुण सामान्यतः केवल मूल दस्तावेज में ही उपलब्ध होते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"फोटो कॉपी केवल दस्तावेज की दृश्य प्रतिलिपि होती है और उसमें वे सभी आंतरिक वैज्ञानिक विशेषताएं समाप्त हो जाती हैं, जिनके आधार पर विश्वसनीय फोरेंसिक जांच संभव होती है। इसलिए केवल फोटो कॉपी पर आधारित विशेषज्ञ की राय मूल दस्तावेज पर आधारित राय की तुलना में स्वाभाविक रूप से कम विश्वसनीय होगी।"
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पक्ष द्वारा किए गए स्वीकारोक्ति या बयान मात्र से यह अधिकार नहीं मिल जाता कि दस्तावेज को विशेषज्ञ के पास भेजना ही पड़े। सबसे पहले यह आवश्यक है कि जांच के लिए उपलब्ध सामग्री स्वयं वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य हो।
कोर्ट ने कहा,
"कोई भी स्वीकारोक्ति इस मूल आवश्यकता को समाप्त नहीं कर सकती कि फोरेंसिक जांच के लिए भेजी जाने वाली सामग्री विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य हो। किसी विशेषज्ञ से केवल अनुमान आधारित राय लेने के लिए जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।"
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों, जैसे किराया रसीदों या मौखिक गवाही के आधार पर अपने किरायेदारी संबंधी दावे को साबित करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।