चीनी नागरिक ने धोखाधड़ी से हासिल की भारतीय नागरिकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का केंद्र को याचिका पर फैसला करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह 4 हफ़्तों के भीतर याचिका पर उचित कारणों के साथ आदेश पारित करे। इस याचिका में ऐसे पूर्व चीनी नागरिक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई, जिस पर धोखाधड़ी से भारतीय नागरिकता हासिल करने का आरोप है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश 'महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया' द्वारा दायर एक रिट याचिका पर दिया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर 6 (जो पहले चीन का नागरिक था और अब नैचुरलाइज़ेशन के ज़रिए भारत का नागरिक है) ने धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने और ज़रूरी तथ्यों को छिपाकर नैचुरलाइज़ेशन का प्रमाण पत्र हासिल किया।
याचिकाकर्ता ने 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (परमादेश रिट) जारी करने की मांग की, जिसमें गृह मंत्रालय को निर्देश दिया जाए कि वह उसकी अर्ज़ी पर तुरंत कार्रवाई करे। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि नैचुरलाइज़ेशन का प्रमाण पत्र नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 10(2)(a) के तहत धोखाधड़ी से हासिल किया गया।
अधिनियम की धारा 10(3) का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी का भारत के नागरिक के रूप में बने रहना जनहित के लिए उचित नहीं है।
इसलिए यह प्रार्थना की गई कि प्रतिवादी नंबर 6 के खिलाफ 1955 के अधिनियम की धारा 10 के तहत कार्रवाई की जाए, जिसमें किसी व्यक्ति की नागरिकता छीनने की पूरी प्रक्रिया बताई गई।
सुनवाई के दौरान, डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि याचिकाकर्ता के लिए यह उचित होगा कि वह कलेक्टर के पास अर्ज़ी दे, जो उसके बाद राज्य सरकार को एक रिपोर्ट भेजेगा। साथ ही राज्य सरकार उस रिपोर्ट को आगे की कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को भेजेगी।
हालांकि, संबंधित धाराओं और नियमों की जाँच करने के बाद पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई अर्ज़ी पर विचार किया जाना ज़रूरी था और अधिकारियों को सीधे तौर पर कार्रवाई करनी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा,
"यदि अर्ज़ी में ठोस आधार हैं तो केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 10 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच शुरू करे। दूसरी ओर, यदि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई अर्ज़ी में कोई ठोस आधार नहीं है तो केंद्र सरकार उचित कारणों के साथ अर्ज़ी खारिज करने का आदेश पारित कर सकती है।"
डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि आवेदन में पर्याप्त सामग्री है तो केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह धारा 10 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच शुरू करे। दूसरी ओर, बेंच ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता द्वारा किए गए आवेदन में कोई सामग्री मौजूद नहीं है तो केंद्र सरकार उचित कारणों के साथ आवेदन को खारिज करने का आदेश पारित कर सकती है।
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार कार्य करे और 4 सप्ताह के भीतर एक तर्कसंगत आदेश के माध्यम से आवेदन पर निर्णय ले।
बेंच ने आगे निर्देश दिया कि यदि केंद्र सरकार जांच शुरू करने का निर्णय लेती है तो उसे नागरिकता नियम, 2009 के नियम 25, 26 और 27 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होगा और कानून के अनुसार प्रतिवादी को उचित नोटिस देना होगा।
इसके साथ ही रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case title - Maha Bodhi Society Of India Thru. Auth. Representative Bhante Gyanalok vs. Union Of India Thru. Secy. Ministry Of Home Affairs And 5 Others 2026 LiveLaw (AB) 199