पुराने मालिक के नाम बिजली बिल और हाउस टैक्स जमा करने वाला प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर मालिकाना हक का दावा करता है, लेकिन उसी संपत्ति के बिजली बिल और हाउस टैक्स पुराने मालिक के नाम से जमा करता रहता है, तो यह उसके द्वारा पुराने मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करना माना जाएगा। ऐसे में प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा टिक नहीं सकता।
जस्टिस संदीप जैन ने यह टिप्पणी गाजियाबाद स्थित एक मकान पर प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) मांगने वाली अपील खारिज करते हुए की।
याचिकाकर्ता का दावा था कि वह वर्ष 1996 से मकान पर खुले, निरंतर और विरोधात्मक (Hostile) कब्जे में है। अपने दावे के समर्थन में उसने शस्त्र लाइसेंस, वाहन पंजीकरण, गैस कनेक्शन, टेलीफोन, बीमा पॉलिसी, मतदाता पहचान पत्र, आयकर रिकॉर्ड और कंपनी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें विवादित मकान का पता दर्ज था।
हालांकि, अदालत ने पाया कि बिजली बिल और संपत्ति कर लगातार पूर्व मालिक कैप्टन विनोद कुमार के नाम पर ही जमा किए जा रहे थे। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार भुगतान करना स्वयं पूर्व मालिक के स्वामित्व को स्वीकार करने के बराबर है, जिससे प्रतिकूल कब्जे का दावा स्वतः कमजोर हो जाता है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी दस्तावेज में किसी संपत्ति का पता दर्ज होना उस व्यक्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि किरायेदार, लाइसेंसी या किसी रिश्तेदार के साथ रहने वाला व्यक्ति भी उसी पते का उपयोग कर ऐसे दस्तावेज प्राप्त कर सकता है।
अदालत ने आगे कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि वह संपत्ति पर कब, कैसे, किस आधार पर, खुले, निरंतर और वास्तविक मालिक के विरोध में 12 वर्ष से अधिक समय तक कब्जे में रहा, तथा इसकी जानकारी वास्तविक मालिक को भी थी। वर्तमान मामले में वादी इन आवश्यक तत्वों को साबित करने में असफल रहा।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि वादी का प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।