डिस्चार्ज अर्जी खारिज होने पर आरोप तय करने में देरी न करें, जब तक स्थगन न हो: इलाहाबाद हाइकोर्ट

Update: 2026-01-27 07:12 GMT

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उत्तर प्रदेश भर की ट्रायल अदालतों को स्पष्ट निर्देश दिए कि किसी अभियुक्त की डिस्चार्ज अर्जी खारिज हो जाने के बाद केवल इस आधार पर आरोप तय करने की प्रक्रिया को टाला नहीं जा सकता कि उस आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण या अपील दायर की गई। हाइकोर्ट ने कहा कि जब तक उच्च अदालत द्वारा डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के आदेश पर स्पष्ट रूप से रोक नहीं लगाई जाती, तब तक ट्रायल अदालतें आरोप तय करने के लिए बाध्य हैं।

जस्टिस चवन प्रकाश की पीठ ने अपने हालिया आदेश में कहा कि यदि डिस्चार्ज की मांग अस्वीकार कर दी गई तो सेशन कोर्ट और मजिस्ट्रेट अदालतों पर कानूनन यह दायित्व है कि वे आरोप तय करें। केवल पुनरीक्षण, अपील या रिट याचिका दाखिल हो जाना अपने आप में कार्यवाही पर रोक नहीं माना जा सकता।

हाइकोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर चिंता जताई कि कई ट्रायल अदालतें डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के बाद आरोप तय करने की कार्यवाही को इस बहाने टाल देती हैं कि मामला हाइकोर्ट में लंबित है, जबकि उस पर कोई स्थगन आदेश नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि यह कानून की स्थापित स्थिति के विपरीत है।

हाइकोर्ट के समक्ष यह मामला अवनीश चंद्र श्रीवास्तव नामक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था। उन्होंने कौशांबी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा उनकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। श्रीवास्तव पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409, 419, 420, 467, 468, 471, 111 और 120बी के तहत गंभीर आरोप लगे हैं।

मामले की FIR वर्ष 2004 में दर्ज की गई, जिसमें आरोप था कि स्थानांतरण के बाद अभियुक्त ने कार्यभार और ग्रामीण विकास से जुड़े दस्तावेज सौंपने में लापरवाही बरती और जाली हस्ताक्षरों के माध्यम से रसीद और बिल वाउचर तैयार किए। अभियुक्त की ओर से सीनियर एडवोकेट वी.पी. श्रीवास्तव ने दलील दी कि आरोप निराधार हैं और जांच के दौरान कथित रूप से गुम फाइलें सह-अभियुक्त की अलमारी से बरामद हुईं।

अभियुक्त ने एक विभागीय जांच रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिसमें चार्जशीट दाखिल होने के लगभग 17 वर्ष बाद उन्हें दोषमुक्त बताया गया। यह तर्क दिया गया कि जब विभागीय कार्यवाही में अभियुक्त को निर्दोष पाया गया तो आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रहना चाहिए।

हाइकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि डिस्चार्ज अर्जी पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट केवल पुलिस रिपोर्ट और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों को ही देख सकता है। अभियुक्त का बचाव या उसके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज इस स्तर पर विचार योग्य नहीं होते। कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में यह जांच आवश्यक नहीं होती कि साक्ष्य अंततः दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त होंगे या नहीं। यदि अभियुक्त के खिलाफ मजबूत संदेह मौजूद है तो आरोप तय किए जा सकते हैं।

हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि विभागीय जांच रिपोर्ट चार्जशीट दाखिल होने के काफी बाद तैयार की गई, इसलिए उसे इस प्रारंभिक चरण में नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 228 और 240 का हवाला देते हुए कहा कि जब डिस्चार्ज का कोई आधार नहीं पाया जाता, तो आरोप तय करना अनिवार्य हो जाता है।

हाइकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 7 फरवरी, 2024 को डिस्चार्ज अर्जी खारिज किए जाने के बावजूद अब तक आरोप तय नहीं किए गए। कोर्ट ने कहा कि उसके समक्ष ऐसे कई मामले आए  जिनमें ट्रायल अदालतें डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के बाद भी आरोप तय करने में अनावश्यक देरी कर रही हैं।

अंततः हाइकोर्ट ने यह कहते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज की कि अभियुक्त के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। साथ ही रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया गया कि इस निर्णय को प्रदेश की सभी जिला अदालतों में प्रसारित किया जाए। जिला जजों को भी निर्देश दिए गए कि वे सभी न्यायिक अधिकारियों को यह स्पष्ट कर दें कि जब तक डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने वाले आदेश पर हाइकोर्ट द्वारा रोक नहीं लगाई जाती, तब तक ट्रायल अदालतों को आरोप तय करना ही होगा।

हाइकोर्ट ने दोहराया कि केवल अपील, पुनरीक्षण या रिट याचिका दाखिल हो जाना किसी भी आपराधिक मामले की कार्यवाही को रोकने का वैध आधार नहीं है।

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