एम्स का लड़की को बालिग घोषित करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे अपने पति के साथ रहने की अनुमति दी [आर्डर पढ़े]

Update: 2018-05-01 10:21 GMT

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की घोषणा के बाद हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता बालिग है और हाई कोर्ट का उसको नारी निकेतन भेजने का आदेश देना सही नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इलाहबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया जिसमें उसने एक लड़की को अपने पति के साथ जाने से मना कर दिया था। कोर्ट ने उसके सीबीएसई के प्रमाणपत्र के आधार पर नाबालिग माना था।

दंपति द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने अपने संक्षिप्त आदेश में कहा था कि उम्र के निर्धारण के बारे में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 94 के अनुसार स्कूल या संबंधित परीक्षा बोर्ड द्वारा जारी मैट्रिक के प्रमाणपत्र को मेडिकल राय की तुलना में बरीयता दी जाएगी।

हाई कोर्ट ने इसके बाद इस लड़की को इलाहाबाद के नारी निकेतन भेज दिया क्योंकि उसे इस प्रमाणपत्र के मुताबिक नाबालिग पाया गया। लड़की ने अपने माँ-बाप के साथ जाने से मना कर दिया था। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद दंपति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने दिल्ली स्थित एम्स में लड़की की रेडियोलॉजिकल जांच का आदेश दिया। एम्स की रिपोर्ट में कहा गया कि इस लड़की की उम्र 19 से 24 के बीच है।

इस रिपोर्ट पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा, “अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निष्कर्षों को देखते हुए हमारी राय में याचिकाकर्ता नंबर 1बालिग़ है और उसको इलाहाबाद के नारी निकेतन भेजने का हाई कोर्ट का निर्णय सही नहीं था। याचिकाकर्ता नंबर 1 ने हमें अपनी शादी के तथ्यों के बारे में बताया है। इसलिए वह याचिका नंबर 2, जो उसका पति है, के साथ जाने के लिए स्वतंत्र है।”

कोर्ट ने लड़की के पति के खिलाफ शुरू किए गए आपराधिक मामले को भी ख़ारिज कर दिया।


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