प्राइवेट ट्रस्ट द्वारा टीचर को नौकरी से निकालने के खिलाफ़ रिट याचिका स्वीकार्य नहीं, विवाद कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
2 Oct 2026 6:37 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले (Unaided) शिक्षण संस्थान द्वारा किसी टीचर को नौकरी से निकालने के खिलाफ़ संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने माना कि यह विवाद पूरी तरह से नियोक्ता (Employer) और कर्मचारी (Employee) के बीच कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा मामला है।
प्राइवेट संस्था के रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) के दायरे में आने और उसके खिलाफ़ किसी खास दावे की स्वीकार्यता के बीच अंतर करते हुए जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा,
“इसलिए अंतर प्राइवेट संस्था के रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में आने और ऐसी संस्था के खिलाफ़ किसी खास दावे की स्वीकार्यता के बीच है। पहला मामला तब हो सकता है जब प्राइवेट संस्था कोई सार्वजनिक कर्तव्य (Public Duty) निभा रही हो; दूसरा मामला पूरी तरह से उस अधिकार और लागू की जाने वाली ज़िम्मेदारी की प्रकृति पर निर्भर करता है, जिसका दावा किया गया। किसी खास मामले में एक प्राइवेट संस्थान आर्टिकल 226 के दायरे में आ सकता है। फिर भी सेवा के कॉन्ट्रैक्ट से पूरी तरह से उत्पन्न कोई खास विवाद रिट अधिकार क्षेत्र से बाहर रह सकता है।”
याचिकाकर्ता ने नौकरी से निकाले जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। प्रतिवादियों (Respondents) ने शुरुआत में ही याचिका की स्वीकार्यता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई।
आपत्ति का जवाब देते हुए याचिकाकर्ता ने 'अंडी मुक्ता सद्गुरु श्री मुक्ताजी वंदास स्वामी सुवर्ण जयंती महोत्सव स्मारक ट्रस्ट बनाम वी.आर. रुदानी', 'वीएसटी इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम वीएसटी इंडस्ट्रीज वर्कर्स यूनियन' और 'उत्तम चंद रावत बनाम यूपी राज्य' मामले में फुल बेंच के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि सार्वजनिक कर्तव्य या सार्वजनिक प्रकृति की ज़िम्मेदारी निभाने वाली प्राइवेट संस्था के खिलाफ़ रिट याचिका दायर की जा सकती है।
प्रतिवादियों ने कहा कि संस्थान प्राइवेट ट्रस्ट है, जिसे किसी कानून के तहत न तो स्थापित किया गया और न ही मान्यता दी गई। यह सरकार से कोई मदद या ग्रांट नहीं लेता है और स्वेच्छा से गाँव के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देता है। फुल बेंच द्वारा तय किए गए दोहरे टेस्ट और 'सेंट मैरीज़ एजुकेशन सोसाइटी बनाम राजेंद्र प्रसाद भार्गव', 'आर्मी वेलफेयर एजुकेशन सोसाइटी बनाम सुनील कुमार शर्मा' और 'दिलीप कुमार पांडे बनाम भारत संघ' के मामलों का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि किसी प्राइवेट संस्थान का कर्मचारी, जिसकी सर्विस की शर्तें किसी कानून (स्टैच्यूट) से तय नहीं होतीं, वह हाईकोर्ट के खास अधिकार क्षेत्र (एक्स्ट्राऑर्डिनरी ज्यूरिस्डिक्शन) का इस्तेमाल नहीं कर सकता।
कोर्ट ने माना कि रिट अधिकार क्षेत्र सिर्फ़ सरकारी संस्थाओं या राज्य के अंगों तक सीमित नहीं है और किसी प्राइवेट संस्था के खिलाफ़ भी 'मैन्डमस' (आदेश) जारी किया जा सकता है, अगर लागू कराई जाने वाली ज़िम्मेदारी सार्वजनिक महत्व की हो। कोर्ट ने कहा कि अहम बात यह नहीं है कि प्रतिवादी (रेस्पॉन्डेंट) की कानूनी हैसियत क्या है, बल्कि यह है कि किस तरह की ड्यूटी लागू करानी है और कोर्ट के सामने आए मामले की प्रकृति क्या है।
कोर्ट ने कहा कि हालांकि शिक्षा काफ़ी सार्वजनिक महत्व का विषय है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्राइवेट शिक्षण संस्थान में नियोक्ता-कर्मचारी (Employer-Employee) के रिश्ते का हर पहलू सार्वजनिक कानून (पब्लिक लॉ) के दायरे में आ जाता है। अगर सर्विस की शर्तों को तय करने वाला कोई कानूनी ढांचा न हो तो मैनेजमेंट और टीचिंग स्टाफ़ के बीच का रिश्ता कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) पर आधारित रहता है। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई कानूनी अधिकार या ट्रस्ट की ऐसी कोई कानूनी ड्यूटी (सार्वजनिक कानून वाली) नहीं दिखाई गई, जिसका उल्लंघन हुआ हो।
यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता द्वारा बताए गए फैसलों से पब्लिक लॉ और प्राइवेट लॉ के बीच का फ़र्क खत्म नहीं होता, कोर्ट ने कहा,
“इसलिए आर्टिकल 226 के तहत मिलने वाले खास अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल प्राइवेट सर्विस विवाद के निपटारे के लिए आम कानूनी उपाय के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता।”
इसके अनुसार, रिट याचिका को सिर्फ़ इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि यह सुनवाई योग्य नहीं है।
Case Title : Nootan Rai v. Union of India and 2 others

