'प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट में चौंकाने वाले मामले': हाईकोर्ट ने BNSS के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन की शक्तियों के गलत इस्तेमाल पर उठाए सवाल
Shahadat
10 Jun 2026 10:07 PM IST

BNSS के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन के प्रावधानों के गलत इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि प्रयागराज और गाजियाबाद जैसे जिलों में पुलिस कमिश्नरों को दी गई मजिस्ट्रेट वाली शक्तियों का "पूरी तरह से गलत इस्तेमाल" हो रहा है।
इस स्थिति को "चौंकाने वाला" बताते हुए जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने यूपी सरकार को आदेश दिया कि वह एक व्यक्ति को ₹2,00,000 का मुआवजा दे। इस व्यक्ति को शांति भंग करने के कथित आरोप में BNSS के प्रिवेंटिव डिटेंशन प्रावधानों के तहत 8 दिनों के लिए गैर-कानूनी तरीके से जेल में रखा गया।
बेंच ने यह भी आदेश दिया कि मुआवजे की यह रकम दोषी असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (ACP) की सैलरी से सीधे वसूली जाए, और इसके लिए एक औपचारिक अनुशासनात्मक जांच की जाए।
इस हफ्ते यह दूसरा मामला है, जब हाईकोर्ट ने यूपी में एक चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया।
इसी दिन एक और आदेश में इसी बेंच ने कहा था कि पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट शांति भंग होने की महज आशंका पर लोगों को कई दिनों के लिए जेल भेज रहे हैं और "बहुत गैर-जिम्मेदाराना तरीके" से काम कर रहे हैं।
संक्षेप में मामला
इस साल 19 मार्च को देर रात करीब 12:50 बजे, खीरी पुलिस स्टेशन (प्रयागराज) के पुलिस अधिकारी जबरन याचिकाकर्ता (मंसूर अहमद) के घर में घुसे और उन्हें अपने साथ ले गए।
जब याचिकाकर्ता नंबर 2 (उनकी पत्नी) ने पुलिस की कार्रवाई का कारण पूछा तो उन्हें कारण नहीं बताया गया और इसके बजाय उन्हें एक तरफ धकेल दिया गया। उन्हें 8 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रखा गया और 27 मार्च को ही रिहा किया गया, जो कि 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर करने के 4 दिन बाद हुआ।
हाईकोर्ट के सामने राज्य ने याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को सही ठहराते हुए दावा किया कि उन्होंने ग्रामीणों को गालियां दी थीं, जिससे शांति भंग होने की आशंका पैदा हो गई। इसलिए यह तर्क दिया गया कि पुलिस ने BNSS की धारा 170, 126 और 135 के तहत उचित कार्रवाई की थी। बेंच को यह भी बताया गया कि 19 मार्च को हिरासत में लिए जाने के बाद, उन्हें ACP के सामने पेश किया गया। चूंकि वे उस दिन ज़मानत (surety) नहीं दे पाए, इसलिए उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। आखिरकार, जब 27 मार्च को उन्होंने व्यक्तिगत ज़मानत दी, तो उन्हें न्यायिक हिरासत से रिहा कर दिया गया।
हालांकि, शुरुआत में ही बेंच ने एक बड़ी गैर-कानूनी बात पर ध्यान दिया: रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि 19 मार्च को, जब याचिकाकर्ता को ACP के सामने पेश किया गया था, तो उन्होंने शांति बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत बॉन्ड देने से इनकार कर दिया।
बेंच ने देखा कि "तलाबी आदेश" (Summoning Order) नाम के एक प्रिंटेड फॉर्म पर ACP ने अहमद को सीधे न्यायिक हिरासत में भेज दिया और मनमाने ढंग से उनकी अगली पेशी की तारीख 8 दिन बाद, यानी 27 मार्च तय की।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता ने 19 मार्च को बॉन्ड नहीं दिया तो ACP को अगली तारीख 20 मार्च तय करनी चाहिए थी ताकि उन्हें ऐसा करने का मौका मिल सके। इसके बजाय याचिकाकर्ता को आठ दिनों तक गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया, जो पूरी तरह से "कानून के प्रावधानों के खिलाफ" है।
जब बेंच ने ऐसे मामलों की और जांच की तो उनके सामने प्रिवेंटिव कानूनों (एहतियाती कानूनों) का बड़े पैमाने पर और व्यवस्थित दुरुपयोग सामने आया।
प्रयागराज के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट से पता चला कि अकेले प्रयागराज कमिश्नरेट में 2025 में प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के प्रावधानों के तहत 1,321 लोगों को हिरासत में लिया गया और 20 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रखा गया।
डेटा से यह भी पता चला कि 2026 में अब तक 721 लोगों को हिरासत में लिया गया और उनकी हिरासत की अवधि 1-3 सप्ताह या उससे अधिक रही है।
बेंच ने अपने 10 पन्नों के आदेश में कहा,
"प्रयागराज कमिश्नरेट में हालात चौंकाने वाले हैं। पुलिस कमिश्नर को मजिस्ट्रेट की शक्तियां दी गई हैं, जिनका जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है।"
इसी तरह कोर्ट ने गाजियाबाद कमिश्नरेट के डेटा की भी समीक्षा की, जिससे पता चला कि 1 मई 2025 से 30 अप्रैल 2026 के बीच कुल 2,522 लोगों को 1 से 17 दिनों के लिए हिरासत में लिया गया। कोर्ट ने इस हिरासत को "कानून के मुताबिक नहीं" बताया।
इस मामले को देखते हुए बेंच ने गाजियाबाद के एक ऐसे ही मामले [चंद्र पाल सिंह बनाम यूपी राज्य और अन्य 2026 LiveLaw (AB)319] में दिए गए अपने विस्तृत फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें कुछ गाइडलाइंस तय की गईं।
खास बात यह है कि कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी व्यक्ति को बिना किसी ठोस वजह के 24 घंटे से ज़्यादा समय तक गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा जाता है तो राज्य को उसे मुआवज़े के तौर पर हर दिन ₹25,000 देने होंगे।
इसलिए यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता को 8 दिनों तक गैर-कानूनी न्यायिक हिरासत में रखा गया, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उसे ₹25,000 प्रति दिन की दर से मुआवज़ा मिलना चाहिए, जो कुल मिलाकर ₹2 लाख होता है और इसे 6 हफ़्तों के अंदर चुकाना होगा।
साथ ही प्रयागराज कमिश्नरेट के पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया गया कि वह 14 सितंबर या उससे पहले इस आदेश के पालन की रिपोर्ट दाखिल करें।
Case title - Mansoor Ahmad @ Lallu and another vs State of U.P. and 4 others 2026 LiveLaw (AB) 321

