CrPC की धारा 362 ज़मानत की शर्तों को बदलने में रुकावट नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 साल बाद ₹64 लाख जमा करने की 'कठिन' शर्त हटाई

Shahadat

3 July 2026 8:38 PM IST

  • CrPC की धारा 362 ज़मानत की शर्तों को बदलने में रुकावट नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 साल बाद ₹64 लाख जमा करने की कठिन शर्त हटाई

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि CrPC की धारा 362 (कोर्ट द्वारा फैसले में बदलाव न करना) के तहत कानूनी रोक ज़मानत आदेश में लगाई गई शर्तों में बदलाव या ढील देने पर लागू नहीं होती है।

    कोर्ट ने खास तौर पर कहा,

    "...ज़मानत देने का आदेश सिर्फ़ एक अंतरिम आदेश (interlocutory order) होता है और यह CrPC की धारा 362 में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश 'मामले का निपटारा करने वाला फैसला या अंतिम आदेश' के दायरे में नहीं आता है। इसलिए CrPC की धारा 362 में दी गई रोक किसी आरोपी व्यक्ति को ज़मानत देने के आदेश में लगाई गई शर्त को बदलने पर लागू नहीं होगी।"

    इस तरह जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने 77 साल के एक व्यक्ति की CrPC की धारा 482 के तहत दायर अर्ज़ी को मंज़ूरी दी। उन्होंने दिसंबर 2013 के ज़मानत आदेश में 12 साल पहले लगाई गई "बेवजह कठिन" शर्त को हटाने की मांग की थी।

    इस शर्त के तहत उन्हें अपनी रिहाई की पूर्व-शर्त के तौर पर एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (AAI) के पक्ष में किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में ₹64,00,000 की फिक्स्ड डिपॉज़िट (जिसे ट्रायल खत्म होने तक समय-समय पर रिन्यू कराना था) जमा करनी थी।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    2011 में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने FIR दर्ज की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि M/S ब्राइट अराकॉन ने वाराणसी एयरपोर्ट पर एप्रन विस्तार परियोजना के दौरान सीमेंट की सप्लाई के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बिल जमा किए, जिससे सरकारी खजाने को ₹25,74,065 का गलत नुकसान हुआ।

    हालांकि आवेदक का नाम FIR में नहीं था, लेकिन बाद में उन्हें M/s B. R. अरोड़ा प्राइवेट लिमिटेड (जो M/s ब्राइट अराकॉन का एक घटक सदस्य था) के डायरेक्टर के तौर पर चार्जशीट किया गया।

    बाद में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें अन्य सभी आरोपों से बरी कर दिया, और केवल IPC की धारा 420 के तहत एक आरोप बाकी रह गया। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने 2021 में सह-आरोपी सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ़ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी को भी रद्द कर दिया और अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को बरकरार रखा।

    नतीजतन, ट्रायल कोर्ट ने अगले आदेश तक कार्यवाही रोक दी और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने (लेकिन नष्ट न करने) का आदेश दिया, ताकि हालात बदलने पर उसे मंगाया जा सके और ट्रायल फिर से शुरू हो सके।

    याचिका का विरोध करते हुए CBI ने एक शुरुआती आपत्ति जताई और तर्क दिया कि CrPC की धारा 362 के तहत कोई अदालत अपने अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर करने के बाद उसमें कोई बदलाव या समीक्षा नहीं कर सकती, सिवाय लिपिकीय या गणितीय गलतियों को सुधारने के।

    CBI ने तर्क दिया कि एक बार ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला हो जाने के बाद हाईकोर्ट 'फंक्टस ऑफ़िसियो' (अधिकार-समाप्त) हो जाता है और उसे अपनी ही शर्तों में बदलाव करने का अधिकार नहीं रहता।

    CBI ने 'अपर्णा पुरोहित बनाम यूपी राज्य' मामले में 2022 के एक समान बेंच के फ़ैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि धारा 362 की रोक के कारण ज़मानत की शर्तों में बदलाव के लिए CrPC की धारा 482 के तहत अर्ज़ी नहीं दी जा सकती।

    दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि CrPC की धारा 482 न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस अदालत की अंतर्निहित शक्तियों की रक्षा करती है और उचित मामले में इस शक्ति का इस्तेमाल करने पर कोई पाबंदी नहीं है।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    इन दलीलों के आधार पर जस्टिस विद्यार्थी ने शुरुआत में CrPC की धारा 362 का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह किसी मामले का निपटारा करने वाले फ़ैसले या अंतिम आदेश में बदलाव या समीक्षा पर रोक लगाती है। इसमें CrPC की धारा 353 में बताया गया फ़ैसला या CrPC की धारा 356 से 360 में बताया गया अंतिम आदेश शामिल है।

    बेंच ने आगे कहा कि अमर नाथ बनाम हरियाणा राज्य (1997), वीसी शुक्ला बनाम राज्य (CBI के ज़रिए) (1979) और उस्मानभाई दाऊदभाई मेमन बनाम गुजरात राज्य (1988) में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों के अनुसार, आवेदक को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश न तो कोई फ़ैसला है और न ही किसी मामले का निपटारा करने वाला अंतिम आदेश; बल्कि यह एक अंतरिम आदेश है।

    बेंच ने रामाधार साहू बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023), LiveLaw (SC) 945 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर भी काफ़ी ज़ोर दिया, जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया कि CrPC की धारा 362 में बताई गई रोक तब लागू नहीं होती, जब कोई आरोपी बदली हुई परिस्थितियों के आधार पर ज़मानत की शर्तों में बदलाव या संशोधन की मांग करता है।

    इसे देखते हुए बेंच ने CBI द्वारा हवाला दिए गए अपर्णा पुरोहित मामले के फ़ैसले को 'per incuriam' (कानून की अनदेखी करके दिया गया फ़ैसला) माना, क्योंकि उसमें ऊपर बताए गए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर ध्यान नहीं दिया गया।

    अपने अधिकार क्षेत्र के बारे में हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए उसकी अंतर्निहित शक्तियाँ (inherent powers) केवल CrPC की धारा 482 से नहीं आती हैं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत एक सुपीरियर कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड के तौर पर उसे ये शक्तियाँ संवैधानिक रूप से मिली हुई हैं।

    अब 64 लाख रुपये की FD जमा करने की ज़मानत शर्त के संबंध में बेंच ने सुमित मेहता बनाम राज्य (NCT ऑफ़ दिल्ली) (2013) और गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का हवाला देते हुए ज़ोर दिया कि आपराधिक कार्यवाही का मकसद विवादित बकाया राशि की वसूली करना नहीं है।

    इस प्रकार, बेंच ने इस शर्त को—जो आवेदक के अपराध के बारे में शुरुआती संतुष्टि (prima facie satisfaction) दर्ज किए बिना लगाई गई—बेहद अनुचित और बोझिल माना। यह देखते हुए कि ट्रायल आगे नहीं बढ़ रहा और 77 साल के याचिकाकर्ता को उसके अपने पैसे से वंचित रखा जा रहा है, जबकि ट्रायल के जल्द खत्म होने की कोई उम्मीद नहीं है, कोर्ट ने जमा करने की शर्त रद्द की।

    कोर्ट ने आदेश दिया कि ₹64,00,000 की फिक्स्ड डिपॉज़िट और उस पर मिले सभी ब्याज को 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को जारी कर दिया जाए।

    याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट पूर्णेंदु चक्रवर्ती पेश हुए, जिनकी मदद एडवोकेट प्रांजल जैन और प्रत्युष शाही ने की।

    दूसरी पार्टी यानी CBI की ओर से एडवोकेट आकाश प्रसाद पेश हुए, जिनकी मदद एडवोकेट शाश्वत द्विवेदी और ईशान खन्ना ने की।

    Case title - Baldev Raj Arora vs. Cbi/ Acb Lko. 2026 LiveLaw (AB) 347

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