S. 313 CrPC | आरोपी से जिस परिस्थिति के बारे में सवाल नहीं पूछा गया, उसे न समझा पाने पर उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

30 Aug 2026 9:59 PM IST

  • S. 313 CrPC | आरोपी से जिस परिस्थिति के बारे में सवाल नहीं पूछा गया, उसे न समझा पाने पर उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी आरोपी से ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 313 के तहत किसी परिस्थिति या सबूत के बारे में सवाल नहीं पूछा था तो उस परिस्थिति या सबूत को न समझा पाने के कारण आरोपी के खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

    जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने 2 जुड़ी हुई आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए और 2006 के हत्या के प्रयास के मामले में IPC की धारा 307 के तहत दोषी ठहराए गए 3 आरोपियों को बरी करते हुए यह टिप्पणी की।

    मामले के मुख्य तथ्य

    अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि अपीलकर्ता-आरोपी आरिफ अली उर्फ ​​आरिफ, मो. कामिल उर्फ ​​गुड्डू और अब्दुल रऊफ ने 9 जून, 2006 को शिकायतकर्ता सुबराती पर देसी पिस्तौल से गोली चलाई, जिससे उसके चेहरे, गर्दन और छाती पर छर्रे लगने से चोटें आई थीं।

    ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को IPC की धारा 307 के तहत दोषी ठहराया और उन्हें 7 साल की कठोर कैद और प्रत्येक पर ₹20,000 का जुर्माना लगाया। अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए वे हाई कोर्टगए।

    हाईकोर्ट ने जिन परिस्थितियों पर विचार किया, उनमें से एक यह थी कि घटना के दौरान आरिफ को भी 4 चोटें आई थीं।

    जांच अधिकारी ने बताया कि आरिफ की मेडिकल जांच जिला अस्पताल, लखीमपुर खीरी में की गई। उसकी मेडिकल जांच में सिर की त्वचा तक गहरे कटे हुए घाव, पीठ पर गहरा लाल-नीला निशान (Contusion) और हाथ पर चोट के कारण सूजन पाई गई।

    चोटें लगभग एक दिन पुरानी थीं और लाठी से लग सकती थीं। हालांकि, ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह नहीं बताया कि आरिफ को ये चोटें कैसे लगीं।

    इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने आरिफ की चोटों के संबंध में डॉक्टर की गवाही खारिज की। कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी की ओर से कोई FIR दर्ज नहीं कराई गई और आरोपियों ने CrPC की धारा 313 के तहत अपने बयानों में चोटों के बारे में कुछ नहीं कहा।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का तर्क CrPC की धारा 313 से संबंधित कानून के विपरीत है।

    जस्टिस विद्यार्थी ने कहा:

    "ट्रायल कोर्ट ने कानून की इस बात को नज़रअंदाज़ किया कि CrPC की धारा 313 के तहत आरोपी से सवाल पूछना कोर्ट की ज़िम्मेदारी है और आरोपी को पूरी कहानी बताने की ज़रूरत नहीं है। अगर मामले के किसी भी पहलू पर आरोपी से कोई सवाल नहीं पूछा गया तो उसके खिलाफ कोई बुरा नतीजा नहीं निकाला जा सकता।"

    इस तरह हाईकोर्ट का निष्कर्ष यह था कि अपीलकर्ता आरिफ ने धारा 313 के तहत अपने बयान में अपनी चोटों का ज़िक्र खुद नहीं किया तो इस बात का इस्तेमाल उसके खिलाफ तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि कोर्ट ने उससे उस स्थिति के बारे में सफाई न मांगी हो।

    हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता आरिफ को लगी चोटों के बारे में अभियोजन पक्ष की सफाई न दे पाने की बात पर भी अलग से विचार किया। हालांकि PW-1 ने इस बात से इनकार किया कि अपीलकर्ता को शिकायतकर्ता के परिवार के सदस्यों ने पीटा था, लेकिन जांच अधिकारी ने पुष्टि की कि घटना के दौरान आरिफ को 4 चोटें आई थीं।

    इस बात पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा:

    "आरिफ की चोटों के बारे में कोई सफाई न होने से यह वाजिब शक भी पैदा होता है कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने पूरी सच्चाई नहीं बताई और इससे अपीलकर्ताओं के वकील की इस दलील को बल मिलता है कि शिकायतकर्ता पक्ष के लोग ही हमलावर थे।"

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता ने दावा किया कि गोली लगने के बाद वह बेहोश हो गया। इसलिए कोर्ट को इस बात पर शक हुआ कि शिकायतकर्ता के बेहोश होने के बाद आरिफ पर लाठियों से हमला किया जा सकता था।

    CrPC की धारा 313 में कमी के अलावा, कोर्ट को प्रॉसिक्यूशन के मामले में घटना की शुरुआत समेत कई और कमियां भी मिलीं।

    FIR में झगड़े की वजह शिकायतकर्ता के बच्चों और रऊफ़ के बच्चों के बीच विवाद को बताया गया, लेकिन बाद में शिकायतकर्ता ने माना कि रऊफ़ के कोई बच्चे नहीं है।

    वहीं, जांच अधिकारी ने एक और बात बताई कि विवाद तब शुरू हुआ, जब रऊफ़ की भैंस ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता की 'टटिया' (बाड़) को नुकसान पहुंचाया। हालांकि, शिकायतकर्ता के भाई ने कहा कि अपील करने वालों के पास कोई मवेशी नहीं है।

    कोर्ट को फायरिंग की जगह और तरीके को लेकर भी विसंगतियां मिलीं। साइट प्लान में दिखाया गया कि अपील करने वालों ने कथित तौर पर एक कमरे के अंदर से फायरिंग की थी, जबकि शिकायतकर्ता 22 कदम दूर था।

    फिर भी उस दीवार में कोई दरवाज़ा या खिड़की नहीं है, जबकि घर 10-फुट ऊंची बाउंड्री वॉल से घिरा हुआ है। कोर्ट ने कहा कि तीनों अपीलकर्ताओं का कमरे के अंदर से शिकायतकर्ता पर उस तरह से फायरिंग करना 'असंभव' लगता है जैसा बताया गया।

    शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया कि उसे बहुत ज़्यादा खून बह रहा था और उसके कपड़े खून से सने हुए थे। हालांकि, मेडिकल सबूतों में खून बहने का कोई ज़िक्र नहीं था, जांच अधिकारी को घटनास्थल पर कोई खून नहीं मिला और पुलिस के सामने खून से सने कोई कपड़े पेश नहीं किए गए।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मेडिकल रिपोर्ट में चोट के आसपास कालापन दर्ज था, जबकि सबूतों से पता चला कि ऐसा कालापन पास से फायरिंग करने पर होता है।

    कोर्ट ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन के इस आरोप से इसका मेल बिठाना मुश्किल था कि गोलियां लगभग 55-60 फीट की दूरी से चलाई गईं।

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने अंततः यह टिप्पणी की:

    "रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को मिलाकर पढ़ने से पता चलता है कि प्रॉसिक्यूशन के मामले में कई अहम कमियां हैं, जो कथित घटना की शुरुआत और तरीके पर ही उचित संदेह पैदा करती हैं"।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने माना कि प्रॉसिक्यूशन अपीलकर्ताओं का अपराध साबित करने में नाकाम रहा। इसलिए उसने सज़ा रद्द की और तीनों आरोपियों को IPC की धारा 307 के तहत बरी कर दिया।

    कोर्ट ने मोहम्मद कामिल की इस दलील पर फैसला करने से भी इनकार किया कि अपराध के समय वह नाबालिग था। कोर्ट ने कहा कि उसके बरी होने के बाद यह मुद्दा केवल सैद्धांतिक रह गया, जब तक कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती न दे।

    Case title - Mohd Kamil Alias Guddu and another vs. State of U.P. Thru. Addl. Secy. Home Deptt. Lko 2026 LiveLaw (AB) 634

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