S. 311 CrPC | ज़रूरी गवाहों को तब भी बुलाया जा सकता है, जब उनका 'एग्ज़ामिनेशन-इन-चीफ़' न हुआ हो: इलाहाबाद हाई कोर्ट

Shahadat

24 July 2026 9:35 AM IST

  • S. 311 CrPC | ज़रूरी गवाहों को तब भी बुलाया जा सकता है, जब उनका एग्ज़ामिनेशन-इन-चीफ़ न हुआ हो: इलाहाबाद हाई कोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 311 के तहत ज़रूरी गवाहों को बुलाने में कोई कानूनी रुकावट नहीं है, भले ही उनका 'एग्ज़ामिनेशन-इन-चीफ़' (मुख्य गवाही) अभी तक न हुआ हो।

    बेंच ने कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचती है कि किसी गवाह से पूछताछ ज़रूरी है, तो ऐसे गवाह को फ़ैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी स्टेज पर बुलाया जा सकता है।

    जस्टिस श्री प्रकाश सिंह की बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने उन्नाव के एडिशनल सेशंस जज के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें CrPC की धारा 311 के तहत दी गई अर्ज़ी खारिज की गई।

    बता दें, CrPC की धारा 311 अदालतों को यह अधिकार देती है कि वे किसी भी व्यक्ति को गवाह के तौर पर बुला सकें, या पहले से पूछताछ किए गए गवाह को दोबारा बुलाकर पूछताछ कर सकें। ऐसा कार्यवाही के किसी भी स्टेज पर किया जा सकता है, अगर केस के सही फ़ैसले के लिए ऐसे सबूत ज़रूरी लगें। इस प्रावधान का मकसद यह पक्का करना है कि फ़ैसला सुनाने से पहले सभी ज़रूरी सबूत अदालत के सामने हों।

    याचिकाकर्ता ने PW-1 (पीड़िता की माँ) और उन 2 एक्सपर्ट्स को बुलाने की मांग की, जिन्होंने CrPC की धारा 161 और 164 के तहत मानसिक रूप से अक्षम पीड़िता के बयान दर्ज करने में मदद की।

    आवेदक के वकील ने कहा कि पीड़िता ने अपने पहले के बयान में बदलाव करते हुए आरोप लगाया कि उसके साथ रेप हुआ, जबकि FIR में ऐसा कोई आरोप नहीं था; उसमें सिर्फ़ मर्यादा भंग करने (outraging modesty) का आरोप है।

    इसलिए यह तर्क दिया गया कि मामले के सही निपटारे के लिए उन एक्सपर्ट्स को बुलाना और उनसे पूछताछ करना ज़रूरी है।

    दूसरी ओर, AGA ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 311 के तहत अर्ज़ी बहुत देर से, यानी P.W.1 (पीड़िता की माँ) के बयान के लगभग 3 साल बाद दायर की गई।

    यह भी कहा गया कि चूँकि प्रस्तावित गवाहों का 'एग्ज़ामिनेशन-इन-चीफ़' (मुख्य गवाही) अभी तक नहीं हुआ, इसलिए उन्हें इस स्टेज पर 'क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन' (जिरह) की इजाज़त नहीं दी जा सकती थी।

    राज्य की दलीलों और ट्रायल कोर्ट के तर्क दोनों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

    "ऐसा निष्कर्ष गलत और बेबुनियाद है, क्योंकि अगर ट्रायल कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचता है कि किसी गवाह से पूछताछ ज़रूरी है, तो ऐसे गवाह को फ़ैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी चरण में बुलाया जा सकता है। इसलिए सिर्फ़ इसलिए गवाहों को बुलाने पर कोई कानूनी रोक नहीं हो सकती कि उनकी मुख्य गवाही (एग्जामिनेशन-इन-चीफ़) अभी तक नहीं हुई है।"

    कोर्ट ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष खुद उन 2 विशेषज्ञों को पेश करने में नाकाम रहा, जबकि पीड़िता के बयान उनकी मौजूदगी और उनकी मदद से दर्ज किए गए।

    कोर्ट ने आगे कहा कि दोषी ठहराने से पहले, आरोपी के बेगुनाह होने से जुड़ी सभी संभावनाओं पर विचार करना ज़रूरी है।

    बेंच ने कहा कि सिर्फ़ देरी की बेबुनियाद धारणा के आधार पर आरोपी के हितों को खतरे में नहीं डाला जा सकता।

    CrPC की धारा 311 के दायरे को समझाते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट किसी भी जांच, ट्रायल या अन्य कार्यवाही के किसी भी चरण में किसी भी व्यक्ति को गवाह के तौर पर बुला सकता है।

    बेंच ने कहा,

    "इससे पता चलता है कि फ़ैसला सुनाने से पहले अगर ट्रायल कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचता है कि ट्रायल के सही और निष्पक्ष निपटारे के लिए किसी गवाह से पूछताछ ज़रूरी है तो ऐसे गवाह को बुलाया जा सकता है।"

    इस संबंध में, बेंच ने 'मंजू देवी बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2019)' और 'नताशा सिंह बनाम CBI (राज्य) 2013' में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का भी हवाला दिया। बेंच ने दोहराया कि जब किसी अहम गवाह से पूछताछ का अनुरोध किया जाता है तो केस की उम्र या उसके लंबित रहने की अवधि अपने आप में निर्णायक नहीं हो सकती। साथ ही CrPC की धारा 311 के तहत मिली शक्ति का मकसद अदालतों को सच का पता लगाने और निष्पक्ष फ़ैसला करने में सक्षम बनाना है।

    इस तरह यह पाते हुए कि 2 विशेषज्ञों के बयान "प्रासंगिक सबूत" थे - खासकर इसलिए क्योंकि रेप का आरोप पहली बार पीड़िता के CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में सामने आया, जो उनकी मदद से दर्ज किया गया - कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द किया।

    मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया गया ताकि धारा 311 के तहत आवेदन पर 8 हफ़्तों के भीतर नए सिरे से विचार किया जा सके।

    Case title - Gulzar Ali v. State of Uttar Pradesh & Others 2026 LiveLaw (AB) 460

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