S. 197 CrPC | कस्टडी में हिंसा पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी नहीं, यह अपराध है: इलाहाबाद हाईकोर्ट का पुलिसकर्मियों को राहत देने से इनकार
Shahadat
11 Sept 2026 12:25 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कस्टडी में लोगों को बार-बार पीटने और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने के आरोपी पुलिसकर्मियों की डिस्चार्ज (आरोप से बरी करने) की अर्जी खारिज करने का फैसला सही ठहराया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी हिंसा को पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता और इसे केवल अपराध ही कहा जा सकता है।
जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने पाया कि कस्टडी में लोगों के हाथ-पैर रस्सी से बांधकर और उन्हें उल्टा लिटाकर बार-बार पीटा गया था।
कोर्ट पुलिसकर्मियों (जिनमें एक महिला पुलिसकर्मी भी शामिल थी) की दो जुड़ी हुई अर्जियों पर सुनवाई कर रही थी। ये अर्जियां बांदा जिले के बबेरू पुलिस स्टेशन से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट के 27 सितंबर, 2024 के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गईं, जिसमें उनकी डिस्चार्ज की अर्जियां खारिज कर दी गईं।
आवेदकों ने CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा का दावा करते हुए तर्क दिया कि कथित हरकतें आधिकारिक ड्यूटी के दौरान की गईं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने उनकी डिस्चार्ज की अर्जियां खारिज करने में "कोई गलती नहीं की" और दोनों अर्जियों को "बिना किसी ठोस आधार के" मानते हुए खारिज किया।
मामले का संक्षिप्त विवरण
पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 147, 323, 504 और 506 के तहत FIR दर्ज की गई। जांच के दौरान, सब-इंस्पेक्टर दिलीप कुमार मिश्रा ने आरोपियों का सहयोग पाने के लिए CrPC की धारा 41A के तहत नोटिस जारी किए।
नोटिस तामील कराने के लिए चार कांस्टेबलों को पडरी गांव भेजा गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों ने कथित तौर पर पुलिस कांस्टेबलों के साथ गाली-गलौज और मारपीट की, नोटिस फाड़ दिए या छीन लिए, ईंट-पत्थर फेंके और कथित तौर पर कांस्टेबल सुखबीर सिंह का मोबाइल फोन छीन लिया।
घटना के बाद पुलिस बल को गांव भेजा गया।
13 मई, 2022 की रात को 4 महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, जबकि अगले दिन एक मुखबिर सहित 4 पुरुषों को गिरफ्तार किया गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिसकर्मियों पर गैर-कानूनी मारपीट, छेड़छाड़, कस्टडी में हिंसा, लूटपाट और झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगाया।
उनकी CrPC की धारा 156(3) के तहत दायर अर्जी पर आदेश के बाद मौजूदा आवेदकों सहित नौ नामजद और कई अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। जब उनकी डिस्चार्ज की अर्ज़ी खारिज कर दी गई तो वे हाईकोर्ट गए।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता और उनके परिवार के सदस्यों की मेडिकल रिपोर्ट देखीं, जिनमें कई चोटों का ज़िक्र था। इनमें उनके कूल्हों, जांघों, पैरों, छाती और शरीर के अन्य हिस्सों पर चोट के निशान और सूजन शामिल है।
कोर्ट ने कहा:
"शिकायतकर्ता समेत ऊपर बताए गए घायल लोगों को लगी चोटों को देखने से पता चलता है कि पुलिस स्टेशन में पुलिस कस्टडी के दौरान उन्हें बार-बार पीटा गया। इसमें अर्ज़ी देने वाले पुलिसकर्मी भी शामिल थे। उनके हाथ-पैर रस्सी से बांधकर उन्हें पेट के बल लिटाया गया था और खास तौर पर कूल्हों, जांघों और पिंडलियों पर वार किए गए।"
इसके बाद बेंच ने साफ़ तौर पर कहा कि इस तरह की हिंसा को पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
उसने यह टिप्पणी की:
"...इसे सिर्फ़ एक गंभीर अपराध ही कहा जा सकता है। यह तर्क भी नहीं दिया जा सकता कि जांच के दौरान पुलिस ने बस अपनी सीमा थोड़ी पार कर ली थी।"
नतीजतन, कोर्ट ने माना कि ऐसी हरकत में शामिल पुलिसकर्मी CrPC की धारा 197 के तहत मिलने वाली किसी भी सुरक्षा के हकदार नहीं थे।
बेंच ने 14 मई, 2022 को पुलिस द्वारा तैयार की गई जनरल डायरी एंट्री की भी जांच की।
रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायत करने वाले को गिरफ़्तारी के दौरान ज़मीन पर गिरने से कथित तौर पर खून बहने वाली चोट लगी थी, जबकि तीन अन्य लोगों को कुंद चीज़ से चोटें (blunt-force injuries) आई थीं। हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को "बिल्कुल बेतुका" बताया कि "गिरफ़्तारी के समय, अगर चारों गिरते हैं और घायल होते हैं तो उन्हें खून बहने लगेगा।"
कोर्ट ने गौर किया कि ट्रायल कोर्ट ने सभी आठ घायल व्यक्तियों की मेडिकल बोर्ड से जांच का आदेश दिया, जिससे चोटों का पता चला।
यह देखा गया कि अगर ऐसा नहीं होता तो केवल पुलिस द्वारा तैयार की गई झूठी रिपोर्ट ही रिकॉर्ड में रहती, जिससे घायल व्यक्तियों के खिलाफ हुए कथित अपराध का पता चलने की संभावना खत्म हो जाती।
पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान हुईं, इसलिए CrPC की धारा 197 के तहत पूर्व मंज़ूरी अनिवार्य थी।
हाईकोर्ट ने कथित कृत्यों और चोटों की प्रकृति को देखते हुए इस दलील को खारिज किया।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि IPC की धाराओं 147, 148, 323, 504, 452, 354 और 395 के तहत चार्ज-शीट दायर की गई, और ट्रायल कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया।
उल्लेखनीय है कि IPC की धारा 354 भी आरोपों में शामिल है। CrPC की धारा 197(1) के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब किसी लोक सेवक पर IPC की धारा 354 के तहत अपराध का आरोप हो, तो किसी मंज़ूरी की आवश्यकता नहीं होती।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
"इस प्रकार, CrPC की धारा 197 (1) के स्पष्टीकरण को देखते हुए, आवेदकों के मामले में किसी मंज़ूरी की आवश्यकता नहीं है, जो आरोपी लोक सेवक हैं।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आवेदकों ने पहले हाईकोर्ट के समक्ष संज्ञान और समन आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन सक्षम अदालत के समक्ष पेश होने और उचित ज़मानत अर्ज़ी दायर करने की अनुमति लेने के बाद 8 फरवरी, 2024 को वह अर्ज़ी वापस ले ली थी।
इसके बावजूद, उन्होंने न तो ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण किया और न ही अपनी डिस्चार्ज अर्ज़ी (आरोप से मुक्ति की अर्ज़ी) दायर करने से पहले ज़मानत प्राप्त की। हाईकोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में धारा 197 के तहत सुरक्षा की मांग करने वाली डिस्चार्ज अर्ज़ी विचारणीय नहीं थी।
अंततः, हाईकोर्ट ने डिस्चार्ज अर्ज़ियों को खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश की पुष्टि की और दोनों आपराधिक अर्ज़ियों को खारिज किया।
Case Title - Lady Constable Shivani Joshi and 2 others vs. State of U.P. and another and connected matter 2026 LiveLaw (AB) 694


