S. 138 NI Act | बाउंस हुए चेक पर साइन न करने वाले जॉइंट अकाउंट होल्डर पर केस नहीं चल सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
11 May 2026 9:36 PM IST

चेक बाउंस होने से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फिर से दोहराया कि जॉइंट अकाउंट होल्डर, जिसने विवादित चेक पर साइन नहीं किए, उस पर Negotiable Instruments Act, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत केस नहीं चलाया जा सकता।
जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने यह भी साफ किया कि NI Act की धारा 141, जो परोक्ष दायित्व (vicarious liability) से जुड़ी है, सिर्फ़ कंपनियों और पार्टनरशिप फर्मों पर लागू होती है, व्यक्तियों पर नहीं।
इस तरह सिंगल जज ने आवेदक (मधु सिंह) के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। गाजियाबाद की स्पेशल CBI कोर्ट ने दो बाउंस हुए चेक से जुड़े शिकायत मामले के सिलसिले में उन्हें समन भेजा था।
संक्षेप में मामला
शिकायतकर्ता/प्रतिवादी नंबर 2 (हरि ओम पाठक) ने आवेदक (सिंह) और सह-आरोपी राहुल थिंद के खिलाफ NI Act की धारा 138 के साथ-साथ IPC की धारा 420 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज की थी।
उनका कहना था कि उन्होंने सह-आरोपी (थिंद) को कारोबार के मकसद से 8 लाख रुपये का लोन दिया। लोन चुकाने के लिए थिंद ने उस जॉइंट अकाउंट से 2 चेक जारी किए, जिसे वह मधु सिंह के साथ मिलकर चलाते थे।
हालांकि, जब चेक बैंक में जमा किए गए तो वे बाउंस हो गए और यह टिप्पणी लिखकर वापस कर दिए गए कि चेक जारी करने वाले का अकाउंट बंद हो चुका है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि दोनों अकाउंट होल्डरों ने जान-बूझकर ऐसे चेक जारी किए जो बाउंस हो गए, और तो और, उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए बैंक अकाउंट भी बंद कर दिया। यह तर्क दिया गया कि लोन चुकाने के लिए वे दोनों संयुक्त रूप से और अलग-अलग तौर पर ज़िम्मेदार थे।
आवेदक के वकील ने ज़ोरदार ढंग से यह तर्क दिया कि चूंकि आवेदक (सिंह) ने चेक पर साइन नहीं किए, इसलिए उनके खिलाफ NI Act की धारा 138 के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि इस मामले में NI Act की धारा 141 के तहत परोक्ष दायित्व का मामला नहीं बनता, क्योंकि यह धारा सिर्फ़ कंपनियों पर लागू होती है, व्यक्तियों पर नहीं। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों पर भरोसा किया, जिनमें अलका खंडू अवहद बनाम अमर श्यामप्रसाद मिश्रा LL 2021 SC 146 और अपर्णा ए. शाह बनाम शेठ डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2013) शामिल हैं। इन फ़ैसलों के आधार पर कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि जॉइंट बैंक अकाउंट के मामले में, सिर्फ़ वही व्यक्ति चेक के डिसऑनर होने के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, जिसने चेक पर साइन किए हों।
इसके अलावा, कोर्ट ने बिजोय कुमार मोनी बनाम परेश मन्ना और अन्य 2024 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर भरोसा करते हुए यह नतीजा निकाला कि NI Act की धारा 141, जो परोक्ष दायित्व (Vicarious Liability) से संबंधित है, सिर्फ़ कंपनियों और पार्टनरशिप फ़र्मों पर लागू होती है, व्यक्तियों पर नहीं।
बेंच ने आगे यह भी पाया कि आरोप मुख्य रूप से सह-आरोपी (Co-Accused) के ख़िलाफ़ लगाए गए और आवेदक की कोई विशेष भूमिका नहीं बताई गई; इसलिए बेंच ने पाया कि उसके ख़िलाफ़ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई मामला नहीं बनता।
इस प्रकार, यह देखते हुए कि आवेदक चेक पर साइन करने वालों में शामिल नहीं थी और इसलिए उसे NI Act की धारा 138 के तहत अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता था, बेंच ने उसकी याचिका मंज़ूर की।
Case title - Madhu Singh vs State of U.P. and Others 2026 LiveLaw (AB) 270

