अभियोजन पक्ष का गवाहों को पेश न कर पाना 'अप्रत्यक्ष रूप से' आरोपी की मदद कर रहा है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने PFI 'टेरर प्लॉट' मामले में ज़मानत दी

Shahadat

13 Aug 2026 9:43 AM IST

  • अभियोजन पक्ष का गवाहों को पेश न कर पाना अप्रत्यक्ष रूप से आरोपी की मदद कर रहा है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने PFI टेरर प्लॉट मामले में ज़मानत दी

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश में हिंदू धार्मिक संगठनों और संवेदनशील जगहों पर हमले की साज़िश के आरोप में UAPA (गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967) के तहत बुक किए गए दो आरोपियों को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि मामले को जल्द निपटाने के बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद ट्रायल में "बहुत धीमी" प्रगति हुई।

    जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने गौर किया कि अपीलकर्ता 17 फरवरी, 2021 से जेल में हैं, लेकिन अब तक अभियोजन पक्ष के 18 गवाहों में से केवल 5 से ही पूछताछ हो पाई।

    अभियोजन पक्ष द्वारा गवाहों को पेश न कर पाने पर नाराज़गी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी विफलता "आरोपियों की अप्रत्यक्ष रूप से मदद करने के अलावा और कुछ नहीं है", भले ही UAPA की धारा 43-D(5) के तहत ज़मानत देने पर कानूनी रोक हो।

    यह आदेश ठीक एक हफ़्ते बाद आया, जब हाईकोर्ट ने 2021 में कथित PFI टेरर प्लॉट मामले में गिरफ्तार 2 आरोपियों के ट्रायल में प्रगति न होने पर हैरानी और सवाल उठाए थे।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    आरोपियों [अंसद बदरुद्दीन और फ़िरोज़ खान] पर IPC की धारा 120-B और 121-A, UAPA की धारा 13, 16, 18 और 20 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3, 4 और 5 के तहत आरोप हैं। गिरफ्तारी के बाद से यह उनकी तीसरी ज़मानत याचिका थी।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ताओं को 16 फरवरी, 2021 को गिरफ्तार किया गया था और कथित तौर पर उनसे कई आपत्तिजनक सामान बरामद किए गए।

    अंसद बदरुद्दीन से बरामद सामान में छह ज़िंदा कारतूसों वाली .32 बोर की पिस्तौल, उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटक की नौ छड़ें और इलेक्ट्रिक बैटरी डेटोनेटर वाले दो विस्फोटक उपकरण, साथ ही मोबाइल फ़ोन, डायरी, पेन ड्राइव और अन्य सामान शामिल थे।

    अभियोजन पक्ष का आरोप है कि फ़िरोज़ से उच्च गुणवत्ता वाले विस्फोटक की सात छड़ें और लाल रंग के DP तार का बंडल, साथ ही अन्य सामान बरामद किए गए। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के सदस्य लखनऊ के कुकरैल पिकनिक स्पॉट पर मिलकर हमले करने और समाज में डर और दहशत फैलाने की योजना बना रहे थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन विस्फोटकों का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में हिंदू धार्मिक संगठनों के वरिष्ठ नेताओं और संवेदनशील जगहों पर हमले के लिए किया जाना था।

    बरामद विस्फोटकों की जांच आगरा की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने की और पाया कि वे PETN (पेंटा एरिथ्रिटोल टेट्रानिट्रेट) थे।

    आरोपियों की दलीलें

    ज़मानत की मांग करते हुए अपीलकर्ताओं ने कहा कि वे फरवरी 2021 से हिरासत में हैं और मुक़दमे की कार्यवाही बहुत धीमी गति से चल रही है। उन्होंने कहा कि FIR दर्ज कराने वाले व्यक्ति (मुखबिर) से जिरह (Cross-Examination) भी पूरी नहीं हुई है, जबकि कुछ औपचारिक गवाहों से पूछताछ हो चुकी है।

    इससे पहले, 7 दिसंबर 2022 को कोर्ट ने ज़मानत याचिका खारिज की थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि मुक़दमे की कार्यवाही 1 साल के भीतर पूरी की जाए। इसके बाद CrPC की धारा 482 के तहत कार्यवाही में हाईकोर्ट ने फिर से निर्देश दिया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों से पूछताछ और जिरह तेज़ी से की जाए।

    इससे पहले, 3 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने लखनऊ के स्पेशल सेशंस जज/NIA/ATS को निर्देश दिया कि वे एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपें, जिसमें बताया जाए कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद मुक़दमे की कार्यवाही पूरी क्यों नहीं हुई।

    ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट से पता चला कि अभियोजन पक्ष के गवाहों से पूछताछ के लिए 95 तारीखें तय की गई थीं। हालांकि 11 गवाहों से मुख्य पूछताछ (चीफ़ एग्जामिनेशन) पूरी हो चुकी थी, लेकिन उनमें से केवल 5 से ही जिरह (Cross-Examination) की गई। अकेले PW-2 से जिरह ही 35 पन्नों तक चली थी, लेकिन फिर भी अधूरी रह गई।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    शुरुआत में ही कोर्ट ने इस बात पर 'हैरानी' जताई कि ट्रायल कोर्ट ने "इस कोर्ट के निर्देशों का पालन करने में उचित तत्परता नहीं दिखाई"।

    बेंच ने मुक़दमे की कार्यवाही के तरीके पर आपत्ति जताई और कहा:

    "...ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 309 (BNSS की धारा 346) के प्रावधान को नहीं अपनाया, जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया कि गंभीर अपराधों (जिनका ज़िक्र इस धारा में है) के लिए रोज़ाना ट्रायल चलाया जा सकता है। अगर अभियोजन पक्ष ट्रायल कोर्ट के सामने अपने गवाहों को पूछताछ या जिरह के लिए पेश करने में नाकाम रहता है तो कोई भी सख़्त आदेश दिया जा सकता है, जिसमें अभियोजन पक्ष पर जुर्माना लगाने का आदेश भी शामिल है।"

    कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रायल में कोई प्रगति नहीं हुई। ऐसे हालात में आरोपी के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए। बेंच ने अभियोजन पक्ष से यह भी सवाल किया कि उन्होंने अपने गवाहों की पूछताछ सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि अपीलकर्ता पाँच साल और चार महीने से ज़्यादा समय से जेल में थे और ट्रायल की रफ़्तार को देखते हुए, इसके जल्द खत्म होने की कोई संभावना नहीं थी।

    बेंच ने 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम के.ए. नजीब' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि जब जेल में रहने की अवधि लंबी हो, ट्रायल में काफ़ी प्रगति न हुई हो और इसके जल्द खत्म होने की कोई संभावना न हो, तो आरोपी के अनुच्छेद 21 के तहत तेज़ी से ट्रायल के अधिकार का मामला बनता है।

    इसके आधार पर बेंच ने यह निष्कर्ष निकाला:

    "...हमें यह उचित लगता है कि मौजूदा अपीलकर्ताओं को ज़मानत पर रिहा किया जाए, क्योंकि इस कोर्ट द्वारा ट्रायल को तेज़ी से खत्म करने के लिए दो बार खास आदेश दिए जाने के बावजूद, अभियोजन पक्ष के केवल 5 गवाहों (जो मुख्य रूप से औपचारिक प्रकृति के हैं) से पूछताछ हुई है; अभियोजन पक्ष के बाकी 13 गवाहों से पूछताछ अभी पूरी होनी बाकी है; मुख्य अभियोजन गवाह, यानी P.W.-2, कई तारीखों पर जिरह के लिए पेश नहीं हुआ, जबकि कुछ सख़्त आदेश भी दिए गए थे और उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए जिरह का मौका भी दिया गया।"

    इसलिए कोर्ट ने ज़मानत खारिज करने वाला 14 मई, 2024 का आदेश रद्द किया और अपील मंज़ूर की।

    अपीलकर्ताओं को ₹5 लाख की दो ज़मानत और उतनी ही रकम का पर्सनल बॉन्ड भरने पर ज़मानत पर रिहा करने का निर्देश दिया गया, साथ ही कई शर्तें भी लगाई गईं, जिनमें ATS के सामने हर पखवाड़े (दो हफ़्ते में एक बार) हाज़िरी देना और बिना इजाज़त उत्तर प्रदेश छोड़ने पर रोक शामिल है। ट्रायल कोर्ट को फिर से निर्देश दिया गया कि वह CrPC की धारा 309/BNSS की धारा 346 का इस्तेमाल करते हुए, बिना किसी गैर-ज़रूरी स्थगन के, मुकदमे की कार्यवाही में तेज़ी लाए और उसे जल्द से जल्द पूरा करे।

    Case title - Ansad Badruddin And Another vs Anti Terrorist Squad Thru. Its Adg/Sp 2026 LiveLaw (AB) 572

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