सिर्फ़ दोषी ठहराए जाने के आधार पर पुलिस कॉन्स्टेबल को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
7 Aug 2026 9:47 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'यूपी पुलिस ऑफिसर्स ऑफ़ द सबऑर्डिनेट रैंक्स (पनिशमेंट एंड अपील) रूल्स, 1991' के नियम 8(2)(a) के तहत किसी पुलिस अधिकारी को सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसे किसी आपराधिक आरोप में दोषी ठहराया गया, जब तक कि अनुशासनात्मक अधिकारी ने पहले उस आचरण पर विचार न किया हो जिसके कारण दोषसिद्धि हुई।
कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी की सज़ा देने का अधिकार पाने के लिए ऐसा विचार करना एक ज़रूरी शर्त है।
1991 के नियमों का नियम 8(2) उचित जांच और अनुशासनात्मक कार्यवाही के बिना पुलिस अधिकारी को बर्खास्त करने, हटाने या उसका पद घटाने पर रोक लगाता है। नियम 8(2) के प्रावधान का क्लॉज़ (a) उन मामलों को इस ज़रूरत से बाहर रखता है, जहां अधिकारी के साथ उस आचरण के आधार पर कार्रवाई की जाती है जिसके कारण उसे आपराधिक आरोप में दोषी ठहराया गया। कोर्ट ने गौर किया कि यह प्रावधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 311(2) के दूसरे प्रावधान (Proviso) के समान है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा,
“बर्खास्तगी की सज़ा देने का अधिकार पाने के लिए सक्षम अधिकारी द्वारा ऐसा विचार करना एक ज़रूरी शर्त थी। हालांकि, रिट याचिका में चुनौती दिया गया आदेश इस पहलू पर पूरी तरह चुप है और कहीं भी प्रतिवादी के उस आचरण पर विचार करने का संकेत नहीं देता, जिसके कारण उसे दोषी ठहराया गया। बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले, अनुशासनात्मक अधिकारी के लिए ऐसे आचरण पर विचार करना ज़रूरी था और उसके बाद ही उचित सज़ा तय की जानी चाहिए।”
प्रतिवादी एक कॉन्स्टेबल है। उसको भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-B, 201 और 498-A और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत सत्र परीक्षण (Sessions Trial) में दोषी ठहराया गया, जिसमें अधिकतम सज़ा दस साल की कठोर कारावास थी। इसी आधार पर अनुशासनात्मक अधिकारी ने 1991 के नियमों के नियम 8(2)(a) के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए 25 जुलाई 2006 के आदेश से उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
उसने लगभग सात साल बाद रिट याचिका के ज़रिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और जेल से रिहा होते ही याचिका दायर की। 3 अक्टूबर 2013 को याचिका स्वीकार की गई और देरी को माफ़ कर दिया गया। इसका आधार यह था कि याचिकाकर्ता लगातार जेल में था और इस वजह से वह पहले कोर्ट नहीं आ सका। बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया गया, संबंधित लाभों के साथ बहाली का निर्देश दिया गया और राज्य को कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने की छूट दी गई।
सिंगल जज ने इस सिद्धांत के आधार पर फैसला सुनाया कि बर्खास्तगी, हटाने या नौकरी से निकालने का आदेश—जो ऐसे आचरण पर आधारित हो जिसके लिए आपराधिक दोषसिद्धि (Conviction) हुई हो—तब तक मान्य नहीं हो सकता जब तक कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने खुद उस आचरण पर विचार न किया हो।
इस फैसले को विशेष अपील में चुनौती देते हुए राज्य ने तर्क दिया कि दोषसिद्धि के खिलाफ आपराधिक अपील अभी भी लंबित है, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज दोषसिद्धि बरकरार थी। यह भी तर्क दिया गया कि बर्खास्तगी आदेश के लगभग सात साल बाद दायर की गई रिट याचिका 'लेचेस' (देरी/विलंब) के कारण खारिज होने योग्य है।
देरी के मामले में कोर्ट ने माना कि जांच का विषय देरी की अवधि नहीं, बल्कि देरी का कारण कितना ठोस है, यह है।
आगे कहा गया,
"अगर देरी का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया तो कुछ दिनों की देरी को भी माफ़ नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर कारण ठोस और पर्याप्त हैं तो बहुत लंबी देरी को भी माफ़ किया जा सकता है।"
कोर्ट ने गौर किया कि एचडी बोरा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 साल की देरी को माफ़ करते हुए कहा था कि 'लेचेस' (देरी) जैसी तकनीकी दलीलों का इस्तेमाल ठोस अधिकारों को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता। मूल चंद्र बनाम भारत संघ मामले में भी देरी की अवधि के बजाय देरी के कारण पर ज़ोर दिया गया।
चूंकि जेल में रहने के कारण प्रतिवादी कोर्ट नहीं आ सका—जो उसके नियंत्रण से बाहर की बात थी—इसलिए कोर्ट ने माना कि देरी का पर्याप्त कारण मौजूद था।
“संवैधानिक अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे अन्याय को दूर करें और देरी या लापरवाही को नज़रअंदाज़ करें, बशर्ते वे देरी या लापरवाही याचिकाकर्ता की बुरी नीयत या घोर लापरवाही के कारण न हुई हो।”
अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक अधिकारी के लिए यह ज़रूरी था कि वह सबसे पहले उस आचरण पर विचार करे, जिसके कारण सेशंस ट्रायल में सज़ा हुई थी। यह देखते हुए कि बर्खास्तगी का आदेश इस पहलू पर चुप था, अदालत ने कहा कि आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
यह देखते हुए कि 1991 के नियमों में तीन बड़ी सज़ाओं का प्रावधान है: सेवा से हटाना, सेवा से बर्खास्त करना और पद कम करना (जिसमें निचले वेतनमान में लाना भी शामिल है), अदालत ने कहा:
“जब एक से अधिक बड़ी सज़ाओं का विकल्प मौजूद हो तो आपराधिक आरोप में सज़ा का कारण बनने वाले आचरण की अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा जांच की जानी चाहिए, ताकि उपलब्ध सज़ाओं में से उचित और निष्पक्ष रूप से सज़ा का चयन किया जा सके और आनुपातिकता (Proportionality) का ध्यान रखा जा सके।”
अदालत ने आगे कहा कि सिंगल जज और इंट्रा-कोर्ट अपील की सुनवाई करने वाली बेंच की शक्तियां समान (Co-Extensive) हैं। अदालत ने कहा कि उसके सुधारात्मक अधिकार क्षेत्र (Corrective Jurisdiction) के तहत केवल सिद्धांत संबंधी त्रुटियों की ही जांच की जा सकती है।
“इस प्रकार, इंट्रा-कोर्ट अपीलीय अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप तभी उचित है जब चुनौती दिया गया फ़ैसला या आदेश स्पष्ट रूप से गलत हो या उसमें गंभीर विसंगति (Perversity) हो। ऐसे अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि उन्हीं तथ्यों के आधार पर कोई दूसरा नज़रिया भी संभव है, खासकर तब जब सिंगल जज द्वारा अपनाया गया नज़रिया तर्कसंगत और उचित हो।”
इसके अनुसार, अदालत ने विशेष अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी को मिलने वाले परिणामी लाभ (Consequential Benefits), अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा उस आचरण पर उचित विचार करने के बाद लिए जाने वाले नए फ़ैसले पर निर्भर करेंगे, जिसके कारण उसे सज़ा हुई।
Case Title: State of U.P. and 3 Ors. vs. Raj Narain Yadav Constable 2026 LiveLaw (AB) 540


