नगर निकाय किराए की बकाया रकम को ज़मीन के लगान की तरह वसूल नहीं कर सकते, वे सिविल केस कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

6 Aug 2026 8:28 PM IST

  • नगर निकाय किराए की बकाया रकम को ज़मीन के लगान की तरह वसूल नहीं कर सकते, वे सिविल केस कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नगर पालिका परिषद को अपने किराएदार से मिलने वाला बकाया किराया ज़मीन के लगान के बकाये की तरह वसूल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा किराया एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत देय राशि है, न कि कोई टैक्स।

    उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 की धारा 173-A नगरपालिका को कलेक्टर से वसूली के लिए आवेदन करने की अनुमति देती है, जैसे कि यह ज़मीन के लगान का बकाया हो, किसी ऐसी राशि के लिए जो बोर्ड को टैक्स के तौर पर देनी हो (सिवाय उस टैक्स के जो तुरंत मांग पर देय हो)। कलेक्टर इस बात से संतुष्ट होने पर कि राशि देय है, उसे उसी तरीके से वसूलने की कार्रवाई करता है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा,

    ".... यह मानते हुए कि संबंधित किराया याचिकाकर्ता से नगर पालिका को देय था, इसे 1916 के अधिनियम की धारा 173-A के तहत स्पष्ट प्रावधान को देखते हुए ज़मीन के लगान के बकाये के रूप में वसूल नहीं किया जा सकता है।"

    रामपुर की तहसील स्वार में नगर पालिका परिषद के परिसर में एक दुकान 1998 में याचिकाकर्ता को पंद्रह साल की अवधि के लिए किराए पर दी गई, लेकिन कब्ज़ा 2006 तक नहीं सौंपा गया। 30 दिसंबर 2006 के एक प्रस्ताव के माध्यम से नगर पालिका ने निर्णय लिया कि किराया नवंबर 2006 से शुरू होगा और प्रत्येक अगले महीने के 5वें दिन तक जमा किया जाएगा। याचिकाकर्ता ने उसी तारीख को उन शर्तों को दर्ज करते हुए एक हलफनामा दायर किया और उसके बाद महीने-दर-महीने किराया जमा किया।

    कार्यकारी अधिकारी ने ज़िला मजिस्ट्रेट के आदेश पर कार्रवाई करते हुए नवंबर 2006 से पहले की अवधि के लिए किराए के रूप में 1,07,800 रुपये की मांग करते हुए नोटिस जारी किया, जिसे सात दिनों के भीतर जमा करना था। याचिकाकर्ता के अनुरोधों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया कि उस अवधि के लिए किराया न लिया जाए जब वह कब्ज़े से बाहर था। तहसील स्वार, रामपुर के तहसीलदार ने 14 सितंबर 2009 को वसूली का विवादित नोटिस जारी किया।

    अपने जवाब में नगर पालिका ने कहा कि उसने खुद नवंबर 2006 से पहले की किसी भी अवधि के लिए किराया न वसूलने का फैसला किया था, लेकिन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के निर्देश पर जुलाई 1999 से नवंबर 2006 तक के किराए के लिए डिमांड नोट भेजा गया। उसने यह भी तर्क दिया कि नोटिस केवल डिमांड नोट के समर्थन में उठाया गया एक कदम था, जिसे चुनौती नहीं दी गई। याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश पब्लिक मनीज़ (रिकवरी ऑफ़ ड्यूज़) एक्ट, 1972 की धारा 3 के तहत देनदार था।

    कोर्ट ने माना कि धारा 173-A के तहत ज़मीन के लगान (land revenue) के बकाये के तौर पर जो राशि वसूली जा सकती है, वह केवल टैक्स के कारण बकाया राशि होती है, जबकि यहां जिस राशि का दावा किया गया था, वह दुकान के आवंटन और कब्ज़ा सौंपने के बीच की अवधि का किराया था।

    1972 के एक्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि नगर पालिका न तो राज्य सरकार है और न ही उस एक्ट की धारा 2(a) के तहत परिभाषित कोई कॉर्पोरेशन है। याचिकाकर्ता किसी ऐसे लोन, एडवांस, ग्रांट, क्रेडिट या गारंटी से संबंधित किसी समझौते का पक्षकार नहीं था, जिसकी परिकल्पना धारा 3 में की गई।

    आगे कहा गया,

    “एक कॉर्पोरेट निकाय के रूप में नगर पालिका की प्रकृति को देखते हुए उसके कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े बकाये की वसूली 1972 के एक्ट के तहत वसूले जाने वाले सार्वजनिक धन (Public Money) के दायरे में नहीं आती है। किसी भी तर्क से उक्त एक्ट किराए के तौर पर नगर पालिका को देय धन के बकाये पर लागू नहीं हो सकता है। ये पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े बकाये हैं।”

    कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि नंद किशोर बनाम कलेक्टर/डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, रामपुर मामले में, जो उसी नगर पालिका के लिए लगभग उसी अवधि के दुकान के किराए से संबंधित था, एक डिवीज़न बेंच ने माना कि नगर पालिका 1916 के एक्ट की धाराओं 166 से 173 में बताए गए तरीकों से किराए का बकाया वसूल नहीं कर सकती है, क्योंकि ये धाराएँ ज़मीन के लगान के बकाये के तौर पर वसूली की अनुमति नहीं देती हैं। चूंकि विवादित नोटिस उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 279 और 280 के तहत जारी किया गया, इसलिए कोर्ट ने माना कि यह तरीका सही नहीं था; हालांकि, कानूनी समय-सीमा (लिमिटेशन) की शर्तों के अधीन रहते हुए, बकाया राशि की वसूली किसी मुकदमे के ज़रिए की जा सकती थी।

    इसके अनुसार, याचिका स्वीकार की गई और 14 सितंबर 2009 का नोटिस रद्द कर दिया गया। साथ ही नगर पालिका परिषद, स्वार, रामपुर को यह छूट दी गई कि वह कानून के तहत मान्य किसी अन्य तरीके से अपना बकाया वसूल कर सकती है।

    Case Title: Rayeesh Ahmad v. State of U.P. and others

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story