अगर पति कमाने में सक्षम है तो नौकरी न होना या बिज़नेस खराब चलना पत्नी को गुज़ारा-भत्ता न देने का आधार नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
2 Oct 2026 11:36 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पति कमाने में सक्षम है तो वह यह कहकर अपनी पत्नी का गुज़ारा-भत्ता देने की ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या उसका बिज़नेस अच्छा नहीं चल रहा है।
जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने कहा कि ऐसे तर्क सिर्फ़ "बेबुनियाद बहाने" हैं और "कानून में इनकी कोई मान्यता नहीं है"।
कोर्ट ने यह टिप्पणी एक पति द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका ख़ारिज करते हुए की। पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे CrPC की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी को हर महीने ₹3,500 गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया।
पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी अपनी मर्ज़ी से और बिना किसी कारण के अपने माता-पिता के साथ रह रही थी। उसने यह भी दावा किया कि उसके पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है और वह गुज़ारा-भत्ते की रक़म नहीं दे सकता।
उसने आगे आरोप लगाया कि कोर्ट ने उसकी आय का गलत आकलन किया और बिना कोई ठोस कारण बताए आवेदन की तारीख से ही गुज़ारा-भत्ता देने का आदेश दे दिया।
पति की भुगतान न कर पाने की दलील ख़ारिज करते हुए हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 125 का मकसद समझाया।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान का मकसद उस महिला की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना और उसे होने वाली मानसिक पीड़ा और तकलीफ़ को कम करना है, जिसे अपना वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा हो।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी महिला के पास अपना गुज़ारा करने के लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए और उसे वैसी ही ज़िंदगी जीने में सक्षम होना चाहिए जैसी वह अपने पति के घर में जीती।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"जिस महिला को वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा हो, उसे ऐसा महसूस नहीं होने दिया जाना चाहिए कि उसका सम्मान घट गया और उसे गुज़ारे के लिए इधर-उधर भटकना पड़े। कानून के अनुसार, वह वैसी ही ज़िंदगी जीने की हकदार है जैसी वह अपने पति के घर में जीती।"
कोर्ट ने आगे कहा कि गुज़ारा-भत्ता इतना पर्याप्त होना चाहिए कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके और उसे "बेसहारा या भिखारी" बनने के लिए मजबूर न किया जाए।
इस संदर्भ में, कोर्ट ने विशेष रूप से पतियों द्वारा अक्सर उठाए जाने वाले उस तर्क पर बात की जिसमें वे गुज़ारा-भत्ता देने में अपनी आर्थिक अक्षमता का ज़िक्र करते हैं।
अदालत ने यह कहा:
"कभी-कभी पति यह दलील देता है कि उसके पास पैसे देने के साधन नहीं हैं, क्योंकि उसके पास नौकरी नहीं है या उसका बिज़नेस ठीक नहीं चल रहा है। ये सिर्फ़ बेबुनियाद बहाने हैं और असल में कानून में इनकी कोई अहमियत नहीं है।"
अदालत ने 'जसबीर कौर सहगल बनाम ज़िला जज, देहरादून' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया कि गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) की रक़म तय करते समय अदालत को दोनों पक्षों की स्थिति, उनकी ज़रूरतों और पति की भुगतान करने की क्षमता पर विचार करना चाहिए। साथ ही उसके उचित खर्चों और अन्य कानूनी ज़िम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के लिए गुज़ारा-भत्ता सामाजिक न्याय का एक उपाय माना जाता है।
अदालत ने कहा कि जब तक पति कमाने में सक्षम है, वह यह दलील नहीं दे सकता कि आर्थिक तंगी के कारण वह अपनी पत्नी का खर्च नहीं उठा सकता।
अदालत ने कहा,
"जब पत्नी और बच्चों के गुज़ारे-भत्ते का सवाल आता है तो पति की ज़िम्मेदारी ज़्यादा अहम हो जाती है।"
वैवाहिक घर छोड़ने को मजबूर महिला की हालत के बारे में अदालत ने यह कहा:
"जब महिला वैवाहिक घर छोड़ती है तो स्थिति बिल्कुल अलग होती है। वह कई सुख-सुविधाओं से वंचित हो जाती है। कभी-कभी जीवन में भरोसा कम हो जाता है। कभी-कभी उसे लगता है कि उसने अपना सबसे करीबी दोस्त खो दिया है। उसे यह भी लग सकता है कि उसकी निडरता और हिम्मत ही उसकी बदकिस्मती की वजह बनी है।"
जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि इस स्थिति में कानून सिर्फ़ यही राहत दे सकता है कि पति आर्थिक मदद दे।
उन्होंने कहा,
"यही एकमात्र कानूनी मरहम है, क्योंकि उसे किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।"
इसके अलावा, बेंच ने गौर किया कि मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट ने पाया कि पति ने दहेज की मांग पूरी न होने पर पत्नी को घर से निकाल दिया था और वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ है।
इसलिए अदालत ने पति को उसे आर्थिक मदद देने के लिए ज़िम्मेदार माना।
इस तरह अदालत ने ₹3,500 के मासिक गुज़ारा-भत्ते को सही ठहराया क्योंकि यह पूरी तरह से उचित था। इस प्रकार हाई कोर्ट ने पति की क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज की।
Case Title : Mohammad Kamil vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 779

