जौनपुर कस्टोडियल डेथ 2021: हाईकोर्ट ने खारिज की 4 आरोपी पुलिसकर्मियों की ज़मानत अर्ज़ी

  • जौनपुर कस्टोडियल डेथ 2021: हाईकोर्ट ने खारिज की 4 आरोपी पुलिसकर्मियों की ज़मानत अर्ज़ी

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को 2021 के जौनपुर कस्टोडियल डेथ (पुलिस हिरासत में मौत) मामले में आरोपी उत्तर प्रदेश पुलिस के 4 कर्मियों की ज़मानत अर्ज़ियां खारिज कीं।

    अपने 95 पन्नों के आदेश में जस्टिस समित गोपाल ने CBI की चार्जशीट में लगाए गए आरोपों का ज़िक्र किया। इन आरोपों के मुताबिक, आरोपी पुलिसकर्मियों ने मृतक कृष्ण कुमार यादव उर्फ ​​पुजारी से जुर्म कबूलवाने के लिए उन्हें गंभीर चोटें पहुंचाईं और बाद में ऐसी चोटें देकर उनकी हत्या की, जिनसे मौत हो सकती थी।

    CBI ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी मौत को पुलिस हिरासत में शारीरिक टॉर्चर के बजाय किसी दुर्घटना या अज्ञात लोगों द्वारा किए गए हमले का नतीजा दिखाने के लिए झूठे रिकॉर्ड बनाए गए।

    कोर्ट ने जयशील तिवारी, रामकृत यादव, राज कुमार वर्मा और अंगद प्रसाद चौधरी की ज़मानत अर्ज़ियां खारिज कीं। ये वे पुलिसकर्मी हैं, जिनके खिलाफ CBI ने फरवरी 2021 में पुलिस हिरासत में कृष्ण यादव की मौत के मामले में चार्जशीट दाखिल की।

    IPC की धारा 302, 330, 331 और 218 के साथ धारा 34 और धारा 120-B के तहत अपराधों के लिए 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद लखनऊ में स्पेशल CBI जज ने 18 सितंबर, 2024 को आरोप तय किए।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    12 फरवरी, 2021 को जौनपुर के बक्सा पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 302, 394, 452 और 504 के तहत FIR दर्ज की गई।

    FIR के अनुसार, 11 फरवरी, 2021 को तड़के करीब 3 बजे SOG टीम और तत्कालीन बक्सा SHO ने अन्य पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर कृष्ण कुमार यादव को उनके घर से उठाया।

    शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसी रात बाद में पुलिसकर्मी कृष्ण को वापस लाए; वह खड़े होने की हालत में नहीं था और अपनी मां से उन्हें बचाने के लिए चिल्ला रहे था। साथ ही कह रहा था कि पुलिस उसे मार डालेगी। बाद में परिवार को बताया गया कि कृष्णा की मौत पुलिस कस्टडी में हो गई।

    हाईकोर्ट में कार्यवाही के बाद सितंबर 2021 में जांच CBI को सौंप दी गई। इसके बाद CBI ने अपनी FIR दर्ज की और 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। ​​बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को बरकरार रखा।

    शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तीन चोटों का ज़िक्र था - जिसमें कूल्हों, कंधे के निचले हिस्से (स्कैपुलर क्षेत्र) और बाएं हाथ पर लगी चोटें शामिल थीं - और मौत का कारण मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (दिल का दौरा) से होने वाला शॉक और सिंकोप (बेहोशी) बताया गया।

    हालांकि, CBI ने AIIMS, नई दिल्ली के मेडिकल बोर्ड की बाद की राय पर भरोसा किया। बोर्ड का मानना ​​था कि मृतक को कई जगह कुंद चीज़ों से चोटें (Blunt-Force Injuries) आई हैं और मौत का कारण "शरीर पर लगी कई कुंद चोटों के मिले-जुले असर से हुआ शॉक" था।

    बोर्ड ने कहा कि ये चोटें मौत से पहले की (Antemortem) और ताज़ा थीं, और सामान्य परिस्थितियों में मौत का कारण बनने के लिए काफ़ी हैं।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 12 मार्च, 2024 के उस आदेश पर भी विचार किया जिसमें सह-आरोपी जितेंद्र सिंह की ज़मानत रद्द की गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में पुलिस बल के एक सदस्य पर कस्टडी में मौत का आरोप है और ज़मानत पर विचार करते समय सख़्त रुख अपनाना ज़रूरी है।

    कोर्ट ने IPC की धारा 302 के तहत लगे आरोप की गंभीरता पर भी ध्यान दिया और आरोपी को CBI कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया।

    हाईकोर्ट ने देखा कि चल रहे ट्रायल में अभियोजन पक्ष के 11 गवाहों से पूछताछ की जा चुकी है।

    जयशील तिवारी के मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि जांच के दौरान वह कथित तौर पर फरार हो गया, जिसके कारण CrPC की धारा 82 और 83 के तहत कार्रवाई शुरू हुई। कोर्ट ने यह भी देखा कि गिरफ्तारी से पहले ट्रायल के दौरान भी वह फरार हो गया।

    कोर्ट ने माना कि उसके इस व्यवहार से असहयोग और दोबारा फरार होने की आशंका का पता चलता है। इसलिए उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी गई।

    रमाकृत यादव और राज कुमार वर्मा ने दूसरी बार ज़मानत की मांग की, जबकि कोर्ट ने 2022 में उनकी पिछली अर्जियां खारिज की थीं। कोर्ट को उनकी ज़मानत अर्जियों पर दोबारा विचार करने का कोई नया आधार नहीं मिला और उसने उन्हें खारिज किया।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ़ सह-आरोपी के साथ समानता ज़मानत का आधार नहीं हो सकती।

    कोर्ट ने संबंधित मामलों में से एक में हाईकोर्ट की पिछली टिप्पणियों का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि इस घटना में "एक सोची-समझी साज़िश के तहत हिरासत में यातना और लूटपाट के साथ मौत" शामिल थी और यह "पुलिस की शक्तियों के दुरुपयोग और पुलिस की मनमानी का स्पष्ट मामला" है।

    इसे देखते हुए कोर्ट ने ज़मानत की चारों अर्जियां खारिज कर दीं और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह कार्यवाही में तेज़ी लाए और अनावश्यक स्थगन से बचे।

    Case Title : Jaysheel Tiwari vs. Union of India and connected bail applications 2026 LiveLaw (AB) 784

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