मेडिकल सबूत से पुष्टि न होने पर भी पीड़िता की विश्वसनीय गवाही बलात्कार में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Praveen Mishra

12 July 2026 12:11 PM IST

  • मेडिकल सबूत से पुष्टि न होने पर भी पीड़िता की विश्वसनीय गवाही बलात्कार में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 1983 के एक बलात्कार मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए कहा है कि यदि पीड़िता (Prosecutrix) की गवाही विश्वसनीय, सुसंगत और किसी मूलभूत खामी से मुक्त हो, तो केवल इस आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती कि मेडिकल साक्ष्य अभियोजन के मामले की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते।

    जस्टिस संजीव कुमार की पीठ ने वीर सिंह द्वारा दायर आपराधिक अपील खारिज करते हुए कहा कि बलात्कार कोई चिकित्सीय स्थिति नहीं, बल्कि एक कानूनी अपराध है। इसलिए यह तय करना कि बलात्कार हुआ या नहीं, डॉक्टर का नहीं बल्कि अदालत का कार्य है।

    मामले में आरोपी ने दलील दी थी कि पीड़िता के मेडिकल परीक्षण में उसका हाइमन सुरक्षित पाया गया, शुक्राणु नहीं मिले और डॉक्टर ने भी बलात्कार होने की पुष्टि नहीं की। इसके अलावा आरोपी ने एफआईआर दर्ज कराने में 24 घंटे की देरी, जांच में कथित खामियों तथा एक प्रत्यक्षदर्शी के मुकर जाने का हवाला देकर दोषसिद्धि पर सवाल उठाया।

    हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के State of Tamil Nadu v. Ravi @ Nehru (2006) और Ranjit Hazarika v. State of Assam (1998) के फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि डॉक्टर की राय या निजी अंगों पर चोट के निशान न होना, यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय हो, तो बलात्कार के आरोप को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।

    अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले में मेडिकल पुष्टि को अनिवार्य मानना "घाव पर नमक छिड़कने" जैसा होगा। यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है और उसमें कोई गंभीर विरोधाभास नहीं है, तो उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।

    एफआईआर में 24 घंटे की देरी पर अदालत ने कहा कि बलात्कार जैसे मामलों में परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान के कारण तुरंत पुलिस के पास जाने से हिचकिचाता है। इसलिए एक दिन की देरी को अभियोजन के खिलाफ संदेह का आधार नहीं माना जा सकता।

    जांच में कथित कमियों पर भी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषपूर्ण जांच मात्र इस कारण से पूरे अभियोजन मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, यदि अन्य साक्ष्यों से अपराध संदेह से परे सिद्ध हो जाता है।

    इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत अपराध संदेह से परे सिद्ध हो चुका है। अदालत ने अपील खारिज करते हुए आरोपी को शेष सजा काटने के लिए तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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