पैगंबर मोहम्मद के नाम पर भीड़ को उकसाया: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली हिंसा के 'मुख्य साज़िशकर्ता' की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की
Shahadat
7 Jun 2026 10:08 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सितंबर 2025 की बरेली हिंसा के मामले में इत्तेफ़ाक मिल्लत काउंसिल (IMC) के अध्यक्ष तौकीर रज़ा खान की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की।
खान पर लगे आरोपों पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि खान "मुख्य साज़िशकर्ता" हैं, जिन्होंने पैगंबर मोहम्मद के नाम पर एक उग्र भीड़ को भड़काया। उन्हें अच्छी तरह पता था कि भीड़ आगज़नी, दंगा और पुलिसकर्मियों पर हमले कर सकती है और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकती है।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने टिप्पणी की,
"भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सांप्रदायिक सद्भाव ही आधार है। राजनीतिक फायदे के लिए धार्मिक आधार पर लोगों को बांटने और उकसाने की इजाज़त देने से देश का सामाजिक ताना-बाना बिखर सकता है और राष्ट्रीय अखंडता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।"
संक्षेप में मामला
सितंबर, 2025 में एक FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि खान ने मई में एक जनसभा के दौरान भड़काऊ भाषण दिया। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों को राज्य सरकार द्वारा कथित अत्याचारों और झूठे मामले दर्ज करने के खिलाफ विरोध करने के लिए एक इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने के लिए उकसाया था।
आरोप है कि प्रशासन द्वारा ऐसी सभाओं पर रोक लगाने के लिए BNSS की धारा 163 लागू करने के बावजूद, खान के बुलावे पर 200 से 250 लोगों की भीड़ उस जगह की ओर बढ़ी।
जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो वे "सर तन से जुदा" जैसे भड़काऊ नारे लगाने लगे और सरकार के खिलाफ भी नारेबाज़ी की। भीड़ ने पुलिस पार्टी पर पत्थर और पेट्रोल बम भी फेंके और उन पर गोलियां चलाईं, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।
नतीजतन, हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा। FIR में आरोप लगाया गया कि इस घटना ने बरेली में जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया।
हाईकोर्ट के सामने खान के वकील ने दलील दी कि FIR में उनका नाम नहीं था और उन्हें तब फंसाया गया, जब ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था, जिससे यह पता चले कि उन्होंने भीड़ को इकट्ठा होने या आगज़नी करने या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाया था।
इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि खान को भीड़ के ऐसे विनाशकारी इरादों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। दूसरी ओर, राज्य ने उनकी ज़मानत अर्ज़ी का ज़ोरदार विरोध किया। उन्होंने एक चश्मदीद गवाह का बयान पेश किया, जिसने गवाही दी कि खान ने समुदाय को "किसी भी कीमत पर" उस जगह पर इकट्ठा होने के लिए उकसाया था।
चश्मदीद ने आगे बताया कि खान ने भीड़ को साफ़ तौर पर निर्देश दिया कि अगर ज़रूरत पड़े तो वे "आगजनी करें और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करें," और जो कोई भी उन्हें रोकने की कोशिश करे, उस पर हमला करें।
अहम बात यह है कि राज्य ने आरोप लगाया कि घटना के ठीक बाद उन्होंने "धन्यवाद भाषण" वाला वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने और प्रदर्शन को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए मुस्लिम समुदाय के सदस्यों का शुक्रिया अदा किया।
खान के ख़िलाफ़ सभी तथ्यों और आरोपों पर विचार करते हुए जस्टिस देशवाल ने उन्हें भीड़ की हरकतों के लिए परोक्ष रूप से ज़िम्मेदार माना।
अदालत ने कहा कि भीड़ द्वारा किए गए अपराधों के लिए याचिकाकर्ता को भी BNSS की विभिन्न धाराओं के तहत मुख्य साज़िशकर्ता के तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा।
सिंगल जज ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता को ऐसे गैर-कानूनी कामों के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने 'रिहान बनाम यूपी राज्य' मामले में अपने पहले के फ़ैसले का भी हवाला दिया और दोहराया कि "गुस्ताख-ए-नबी की एक सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा" जैसे नारे सशस्त्र विद्रोह को भड़काते हैं और "भारत की संप्रभुता और अखंडता के साथ-साथ कानून के अधिकार के लिए भी एक चुनौती" हैं।
उस मामले में यह माना गया कि ऐसे नारे लोगों को "सशस्त्र विद्रोह" के लिए उकसाते हैं और BNS की धारा 152 के तहत दंडनीय हैं और इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ हैं।
बेंच ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आज़ादी भारत की संप्रभुता और अखंडता से ऊपर नहीं हो सकती।
इसलिए बेंच ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार किया। उन्होंने खान के 'लंबे' आपराधिक इतिहास और इस 'काफ़ी जोखिम' की ओर इशारा किया कि अगर उन्हें रिहा किया जाता है तो वे एक बार फिर किसी खास समुदाय को भड़का सकते हैं और शांति और सद्भाव बिगाड़ सकते हैं।

