कोऑपरेटिव सोसाइटी के बंटवारे से डेलीगेट्स का दर्जा खत्म, पुराना नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर बनाए रखने से योग्यता बरकरार नहीं रहती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • कोऑपरेटिव सोसाइटी के बंटवारे से डेलीगेट्स का दर्जा खत्म, पुराना नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर बनाए रखने से योग्यता बरकरार नहीं रहती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब यूपी कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ एक्ट, 1965 की धारा 126 के तहत किसी कोऑपरेटिव सोसाइटी का बंटवारा होता है तो मूल सोसाइटी भी एक नई कॉर्पोरेट बॉडी बन जाती है, भले ही उसे अपना पुराना नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर बनाए रखने की इजाज़त दी गई हो।

    कोर्ट ने कहा कि ऐसे बंटवारे के बाद मूल सोसाइटी के डेलीगेट्स, यूपी कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ रूल्स, 1968 के नियम 87(ix) के तहत डेलीगेट नहीं रह जाते और नियम 453(1)(h) के तहत डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक की मैनेजमेंट कमिटी के सदस्य के तौर पर बने नहीं रह सकते।

    एक्ट की धारा 126 रजिस्ट्रार को किसी कोऑपरेटिव सोसाइटी को दो या उससे ज़्यादा सोसाइटियों में बांटने का निर्देश देने का अधिकार देती है, जिसे फिर धारा 16 के तहत प्रक्रिया से पूरा किया जाता है। नियमों का नियम 87(ix) कहता है कि अगर जिस सोसाइटी का कोई डेलीगेट प्रतिनिधित्व करता है, उसका बंटवारा हो जाता है तो वह डेलीगेट नहीं रह जाता; वहीं नियम 453(1)(h) ऐसे व्यक्ति को मैनेजमेंट कमिटी में बने रहने से रोकता है जो जनरल बॉडी का सदस्य नहीं है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा,

    “इस प्रकार, पहले से मौजूद कोऑपरेटिव सोसाइटियों की कानूनी पहचान बदल जाएगी और नए रूप में पहले से मौजूद सोसाइटियां एक्ट, 1965 की धारा 9 के तहत पूरी तरह से अलग कॉर्पोरेट बॉडी होंगी। इसलिए महत्वपूर्ण बात केवल सोसाइटी का लेबल—यानी उसका रजिस्ट्रेशन नंबर या नाम—नहीं है, बल्कि बंटवारे की कानूनी प्रक्रिया से बनने वाला उसका वास्तविक स्वरूप और कानूनी पहचान है।”

    याचिकाकर्ता मुजफ्फरनगर के डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक की जनरल बॉडी का डेलीगेट और सदस्य है। उसने बैंक की मैनेजमेंट कमिटी के तीन सदस्यों के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, जिनमें से एक उसका चेयरमैन है। ये तीनों B-PACS खेड़ा मस्तान, B-PACS मुज़फ़्फ़रनगर पश्चिमी और B-PACS पेनाना के प्रतिनिधि के तौर पर बैंक की जनरल बॉडी के सदस्य बने है और जून 2023 में हुए चुनावों में मैनेजमेंट कमेटी के लिए चुने गए।

    2025 में, मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के असिस्टेंट कमिश्नर/डिस्ट्रिक्ट असिस्टेंट रजिस्ट्रार (कोऑपरेटिव सोसाइटीज़) ने एक्ट की धारा 126 के तहत इन तीनों सोसायटियों को बांटने का आदेश दिया, जिसके तहत कई गांवों को उनके काम के दायरे से निकालकर नई बनी सोसायटियों में शामिल कर दिया गया। नई सोसायटियों को नए रजिस्ट्रेशन नंबर दिए गए, जबकि पुरानी सोसायटियां अपने पुराने नामों और रजिस्ट्रेशन नंबरों के साथ काम करती रहीं।

    हाईकोर्ट में जाकर और 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेश की रिट) की मांग करते हुए याचिकाकर्ता ने दलील दी कि बंटवारे के बाद, पुरानी सोसायटियां अपने पहले वाले रूप में नहीं रहीं और प्राइवेट प्रतिवादी नियमों के नियम 87(ix) और नियम 453(1)(h) के तहत अयोग्य हो गए। यह भी कहा गया कि जानकारी होने के बावजूद, न तो बैंक और न ही रजिस्ट्रार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की।

    राज्य के वकील ने तर्क दिया कि कुछ गांवों को नई सोसाइटी में ले जाने से पुरानी सोसायटियों की पहचान नहीं बदली, क्योंकि वे अभी भी अपने मूल रजिस्ट्रेशन नंबरों के साथ मौजूद थीं। बैंक के वकील ने तर्क दिया कि बंटवारा तभी प्रभावी होता है, जब एक्ट की धारा 7 के तहत नया रजिस्ट्रेशन हो। चूंकि पुरानी सोसायटियों का नया रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ, इसलिए नियम 87 लागू नहीं होता।

    कोर्ट ने माना कि एक्ट की धारा 9 के तहत रजिस्ट्रेशन एक कोऑपरेटिव सोसाइटी को एक अलग कानूनी पहचान देता है, जिसकी पहचान उस नाम और नंबर से होती है, जिसके तहत वह रजिस्टर्ड है। कोर्ट ने माना कि बंटवारे से नई सोसायटियां बनती हैं। यहां तक ​​कि वह पुरानी सोसाइटी भी, जिसके काम का दायरा, संपत्ति और देनदारियां बदल गईं, एक नई संस्था बन जाती है। कोर्ट ने कहा कि पुराना नाम और नंबर बनाए रखना केवल एक प्रशासनिक काम था।

    कोर्ट ने माना कि धारा 126 के तहत आदेश केवल बंटवारे की प्रक्रिया शुरू करता है और बंटवारा एक्ट की धारा 16 के तहत प्रक्रिया से पूरा होता है।

    बंटवारे के तरीके पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा,

    “तीसरे प्रतिवादी ने 1965 के एक्ट की धारा 126 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बंटवारे का आदेश जारी किया। इस दौरान, उन्होंने पुरानी सोसायटियों के नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर को बनाए रखने का एक अनोखा तरीका निकाला, ताकि बंटवारे से होने वाले कानूनी नतीजों से चालाकी से बचा जा सके।”

    चूंकि बंटवारे के आदेशों को चुनौती नहीं दी गई, इसलिए कोर्ट ने पुराने नामों और रजिस्ट्रेशन नंबरों को बनाए रखने के फैसले में कोई दखल नहीं दिया। कोर्ट ने माना कि पुराने नंबरों को बंटवारे के बाद बनी सोसायटियों के लिए एक्ट की धारा 16 के तहत अलॉट किए गए नंबर माना जाएगा।

    कोर्ट ने माना कि सोसायटियों के बंटवारे के बाद नियम 87(ix) के तहत प्रतिवादी नंबर 6 से 8 डेलीगेट नहीं रहे। इसलिए नियम 453(1)(h) के तहत वे बैंक की मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य के तौर पर बने नहीं रह सकते थे। कोर्ट ने यह भी माना कि चेयरमैन, जिनका पद डेलीगेट के तौर पर उनके स्टेटस पर निर्भर था, वे भी चेयरमैन के तौर पर बने नहीं रह सकते।

    इसके अनुसार, रिट याचिका मंजूर कर ली गई।

    Case Title: Sachin Kumar Jain v. State of U.P. and 7 others 2026 LiveLaw (AB) 734

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story