डीएम ने बंद किए 'अमर उजाला' को सरकारी विज्ञापन, हाईकोर्ट ने कहा- 'तानाशाही आदेश चौथे स्तंभ की स्वायत्तता पर चोट करते हैं'

Shahadat

10 April 2026 10:48 AM IST

  • डीएम ने बंद किए अमर उजाला को सरकारी विज्ञापन, हाईकोर्ट ने कहा- तानाशाही आदेश चौथे स्तंभ की स्वायत्तता पर चोट करते हैं

    'अमर उजाला' अखबार को राहत देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में संभल के ज़िलाधिकारी (DM) को निर्देश दिया कि वह इस मामले में 'व्यावहारिक' दृष्टिकोण अपनाएं, जिसमें अखबार ने आरोप लगाया था कि उन्हें सरकारी विज्ञापन नहीं दिए जा रहे हैं।

    'अमर उजाला' का पक्ष यह था कि संबंधित डीएम ने एक गुरुद्वारा विवाद से जुड़ी खबर के आधार पर आदेश पारित किया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने बाद में स्पष्टीकरण (Corrigendum) प्रकाशित करके अपना पक्ष साफ कर दिया था, फिर भी आदेश पारित कर दिया गया, जिसके बाद उन्हें सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गए।

    उन्होंने तर्क दिया कि राज्य के अधिकारियों की यह कार्रवाई काफी 'भेदभावपूर्ण' है।

    जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस विवेक सरन की पीठ ने याचिकाकर्ता के इस तर्क से पूरी तरह सहमति जताई कि अधिकारियों के पास प्रकाशक के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उचित मंच (Forum) उपलब्ध है।

    अखबार के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए पीठ ने टिप्पणी की,

    "इस तरह का कोई भी तानाशाही आदेश, जैसा कि इस मामले में पारित किया गया, निश्चित रूप से 'चौथे स्तंभ' (प्रेस) की स्वायत्तता पर चोट करता है।"

    संक्षेप में कहें तो, याचिकाकर्ता के अखबार में स्थानीय गुरुद्वारा में चल रहे विवाद से संबंधित एक खबर प्रकाशित हुई। 16 सितंबर, 2025 को स्थानीय आयुक्त (Commissioner) ने इस मामले में आदेश पारित किया।

    तत्काल कार्रवाई करते हुए प्रकाशक-याचिकाकर्ता ने एक स्पष्टीकरण जारी किया। उन्होंने 18 सितंबर, 2025 को अपने दैनिक अखबार के 'अपना शहर' (रामपुर संस्करण) में अपने स्पष्टीकरण वाले पक्ष को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

    इसके बावजूद, 17 सितंबर को आयुक्त के कार्यालय से डीएम और स्थानीय पुलिस अधिकारियों को याचिकाकर्ता के आचरण के संबंध में एक पत्र भेजा गया।

    इसके बाद, 15 अक्टूबर, 2025 को डीएम ने आदेश पारित किया, जिसमें उन्होंने "प्रकाशन के साथ सहयोग करने से इनकार" किया; परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गए।

    इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि खबर में ऐसा कुछ भी आपत्तिजनक नहीं रह गया, जिसके आधार पर ज़िला प्रशासन द्वारा इतनी कठोर कार्रवाई की जा सके। पब्लिशर ने दलील दी कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने 18 सितंबर को पहले ही किए गए स्पष्टीकरण वाले प्रकाशन को वेरिफ़ाई किए बिना ही विवादित आदेश पारित कर दिया।

    दूसरी ओर, राज्य के स्टैंडिंग काउंसिल ने कहा कि याचिकाकर्ता को 17 दिसंबर, 2025 को एक नोटिस जारी किया गया। साथ ही स्पष्टीकरण देने तथा डीएम के सामने पेश होने पर उचित आदेश पारित किए जाएंगे।

    रिकॉर्ड्स की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने इस विवाद को इस चरण पर 'मामूली मुद्दा' माना। बेंच ने कहा कि कमिश्नर के शुरुआती निर्देशों का याचिकाकर्ता ने 18 सितंबर के संस्करण में ही पूरी तरह से पालन किया था।

    इसलिए याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने अमर उजाला को निर्देश दिया कि वह 17 दिसंबर के नोटिस के अनुसार दो हफ़्तों के भीतर एक नया आवेदन दे।

    कोर्ट ने निर्देश दिया,

    "डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट इस मामले में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए, और 18.9.2025 की न्यूज़ डेली के प्रकाशन में पब्लिशर द्वारा खुद किए गए सुधारों पर विचार करते हुए उसके एक हफ़्ते के भीतर इस पर एक आदेश पारित करेंगे।"

    इस प्रकार याचिका का निपटारा किया गया।

    Case title - M/S Amar Ujala Limited vs. State Of U.P. And Another 2026 LiveLaw (AB) 201

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