ज़मानत नियम है: राष्ट्रीय ध्वज का 'अपमान' करने के आरोप में एक साल जेल में बिताने वाले आरोपी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी राहत

Shahadat

28 May 2026 12:32 PM IST

  • ज़मानत नियम है: राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने के आरोप में एक साल जेल में बिताने वाले आरोपी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी राहत

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते ऐसे व्यक्ति की दूसरी ज़मानत याचिका मंज़ूर की, जिस पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पर एक कुत्ते को बिठाकर उसका अपमान करने वाली तस्वीर अपलोड करने और अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर कथित तौर पर 'पाकिस्तान-समर्थक' सामग्री पोस्ट करने का आरोप था।

    जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने आरोपी वासिक त्यागी को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले सैयद इफ़्तिख़ार अंद्राबी बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी, जम्मू 2026 LiveLaw (SC) 512 का हवाला दिया, जिसमें 'ज़मानत नियम है और जेल अपवाद' के सिद्धांत को दोहराया गया था।

    जस्टिस शुक्ला ने टिप्पणी की कि हालांकि आरोप गंभीर है। फिर भी यह आरोपी को अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत उसके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता।

    पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि अब तक आवेदक के ख़िलाफ़ कोई आरोप तय नहीं किए गए हैं, और मुक़दमे का निकट भविष्य में पूरा होना भी संभव नहीं है।

    कोर्ट ने अपने पाँच-पृष्ठ के आदेश में ज़ोर दिया,

    "आवेदक की मुक़दमे से पहले की हिरासत अनिश्चित काल तक नहीं हो सकती... दोषसिद्धि से पहले आवेदक की हिरासत दंडात्मक प्रकृति की नहीं हो सकती। सज़ा केवल दोषसिद्धि के बाद ही दी जा सकती है।"

    संक्षेप में मामला

    16 मई, 2025 को एक FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी (वासिक त्यागी) ने अपनी फ़ेसबुक ID पर कुछ सामग्री पोस्ट की थी, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने वाली अशोभनीय पोस्ट अपलोड की गई थीं और पूरे देश को नीचा दिखाने तथा उसका अपमान करने के उद्देश्य से टिप्पणियां की गई थीं।

    FIR के अनुसार, आवेदक ने एक पोस्ट में लिखा था "कामरान भट्टी, तुम पर गर्व है। पाकिस्तान ज़िंदाबाद," और दूसरी पोस्ट में उसने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की मॉर्फ़्ड (बदली हुई) तस्वीर अपलोड की थी, जिसमें ध्वज को एक बैठे हुए कुत्ते के ऊपर रखा हुआ दिखाया गया था।

    FIR में आरोप लगाया गया कि इस पोस्ट से धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता तथा वैमनस्य पैदा होने की आशंकाएं उत्पन्न हुईं।

    इससे पहले, पिछले साल सितंबर में अन्य पीठ ने उसकी पहली ज़मानत याचिका ख़ारिज की थी।

    अतः, उसने यह दूसरी ज़मानत याचिका दायर की, जिसमें उसके वकील ने यह तर्क दिया कि आवेदक का कभी भी ऐसा कोई कार्य करने का इरादा नहीं था, जिससे अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा मिलने का संकेत मिलता हो। वह कभी भी देश की संप्रभुता, एकता या अखंडता को ख़तरे में नहीं डालेगा। आगे यह तर्क दिया गया कि आवेदक के कृत्य को भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाला कृत्य नहीं माना जा सकता।

    दूसरी ओर, राज्य की ओर से AGA ने यह दलील दी कि आवेदक का इरादा अलगाववाद भड़काना और भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालना था।

    यह भी कहा गया कि किसी भारतीय नागरिक द्वारा इस तरह की गतिविधियां एक बहुत ही गंभीर मामला हैं और इस न्यायालय द्वारा इनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

    हालांकि, पीठ ने उसे ज़मानत दी और यह बात नोट की कि आवेदक लगभग एक साल से जेल में है और अभी तक मुकदमा शुरू नहीं हुआ।

    Case title - Vasik Tyagi vs. State of U.P. 2026 LiveLaw (AB) 297

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