समान मामले में शामिल दो सह-आरोपियों में से एक को ज़मानत देने और दूसरे को ज़मानत न देने का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जज से मांगा स्पष्टीकरण
Shahadat
27 Jun 2026 8:48 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाज़ियाबाद के एडिशनल सेशन जज से स्पष्टीकरण मांगा। यह मामला एक ही आपराधिक केस में शामिल दो सह-आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं पर अलग-अलग तरह से कार्रवाई करने से जुड़ा है।
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने स्पष्टीकरण मांगा और ज़ोर दिया कि न्यायिक एकरूपता और कानूनी सिद्धांतों का समान रूप से पालन संस्थागत महत्व के मामले हैं।
बता दें, न्यायिक अधिकारी ने एक आरोपी को ज़मानत देने से इनकार किया, जबकि उसे लगी चोटें (जो कथित तौर पर उसी ने पहुंचाई थीं) मामूली प्रकृति की थीं। लेकिन बाद में उसी तरह के मामले में शामिल दूसरे सह-आरोपी को ज़मानत दे दी गई, जबकि कथित अपराध में दोनों की भूमिकाएं काफी हद तक एक जैसी थीं।
हाईकोर्ट असल में मोहम्मद रफ़ीक उर्फ़ रफ़ीकुल इस्लाम द्वारा दायर ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। रफ़ीक पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 109(1), 352, 351(2), 115(2), 191(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता ने घायल नौशाद को चाकू से चोट पहुंचाई। हालांकि, उसके वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता पूरी तरह से निर्दोष है और उसे मामले में झूठा फंसाया गया।
उसके वकील ने मेडिकल रिपोर्ट में बताई गई नौशाद की चोटों का ज़िक्र किया। यह बताया गया कि पीड़ित के शरीर पर कुल 10 चोटें थीं, जिनमें से केवल 1 चोट चाकू से लगी थी और वह चोट याचिकाकर्ता द्वारा पहुंचाई गई बताई गई।
यह तर्क दिया गया कि चोटें मामूली प्रकृति की थीं और जानलेवा नहीं थीं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह भी बताया गया कि इसी तरह के मामले में शामिल एक सह-आरोपी (अंशु), जिस पर भी चाकू से चोट पहुंचाने (एक अन्य घायल व्यक्ति को) का आरोप था, उसे संबंधित अदालत ने 9 जून, 2026 के आदेश के ज़रिए पहले ही ज़मानत दी थी।
इस प्रकार, यह कहा गया कि चूंकि याचिकाकर्ता का मामला सह-आरोपी अंशु के मामले जैसा ही है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, इसलिए उसे भी ज़मानत पर रिहा किया जा सकता है। हालांकि, राज्य ने ज़मानत की अर्ज़ी का ज़ोरदार विरोध किया और कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसे काफ़ी सबूत हैं, जिनसे पता चलता है कि आरोपी अपराध में सीधे तौर पर शामिल था।
इन दलीलों पर विचार करते हुए बेंच ने सबसे पहले यह देखा कि घायल व्यक्ति को लगी चोट मामूली थी और आरोपी ने घायल व्यक्ति के कंधे के पिछले हिस्से पर सिर्फ़ एक बार वार किया।
बेंच ने इस बात पर भी गौर किया कि एक अन्य व्यक्ति को चोट पहुंचाने में समान भूमिका निभाने वाले सह-आरोपी को संबंधित अदालत पहले ही ज़मानत दे चुकी थी।
इस प्रकार, मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना हाईकोर्ट ने आरोपी को ज़मानत दी।
हालांकि, ज़मानत देते समय बेंच ने यह भी नोट किया कि गाज़ियाबाद की कोर्ट नंबर 7 के एडिशनल सेशंस जज ने 14 मई, 2026 को आरोपी की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की, जबकि उसी अदालत ने कुछ हफ़्ते बाद (9 जून, 2026 को) इसी तरह की स्थिति वाले एक सह-आरोपी को ज़मानत दी।
बेंच ने पाया कि आरोपी की ज़मानत खारिज करने के अपने आदेश में अदालत ने चोटों और अभियोजन पक्ष के इस दावे पर ध्यान दिया कि आरोपी ने "जान से मारने की नीयत" से शिकायतकर्ता पर चाकू से हमला किया और यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी को "मुख्य भूमिका" में रखा था।
इन्हीं आधारों पर जज ने फ़ैसला सुनाया कि रफ़ीक़ को रिहा करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं था।
फिर भी एक महीने से भी कम समय बाद 9 जून 2026 को उसी गाज़ियाबाद जज ने सह-आरोपी अंशु की ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई की। पीड़ित दीपक का बयान दर्ज होने के बावजूद - जिसमें कहा गया कि अंशु (सह-आरोपी) और रफ़ीक (आरोपी-आवेदक) चाकू लेकर आए और जान से मारने की नीयत से तुरंत हमला किया - कोर्ट ने अंशु को ज़मानत पर रिहा करने का फ़ैसला किया।
ऐसा करते हुए निचली अदालत ने बस इतना कहा,
"मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और मेरिट पर कोई टिप्पणी किए बिना आरोपी को ज़मानत पर रिहा करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।"
ज़मानत के आदेशों में इस अंतर को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी से इस तरह स्पष्टीकरण मांगा:
"इसलिए ए़डिशनल सेशन जज, कोर्ट नंबर 7 गाज़ियाबाद को निर्देश दिया जाता है कि वह इस कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से इस सूचना के मिलने के सात दिनों के भीतर विस्तृत स्पष्टीकरण दें। इसमें उन खास तथ्यों, परिस्थितियों या कानूनी विचारों का ज़िक्र हो, जिनके आधार पर कोर्ट ने एक जैसी स्थिति वाले सह-आरोपी अंशु को ज़मानत दी, लेकिन मौजूदा आरोपी-आवेदक की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की।"
बेंच ने आगे कहा कि स्पष्टीकरण में खास तौर पर उन अहम बातों का ज़िक्र होना चाहिए, जिनकी वजह से कोर्ट की राय में जारी किए गए आदेशों में अलग-अलग फ़ैसले लेना सही ठहराया जा सका।
हालांकि, जस्टिस सिंह ने साफ़ किया कि यह आदेश प्रशासनिक कारणों से जारी किया जा रहा है और अभी इसे संबंधित न्यायिक आदेशों की मेरिट पर कोई राय ज़ाहिर करने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

