पिछली कार्यवाहियां छिपाकर PIL दाखिल करना पड़ा महंगा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹2 लाख का जुर्माना लगाया

Praveen Mishra

31 Aug 2026 4:14 PM IST

  • पिछली कार्यवाहियां छिपाकर PIL दाखिल करना पड़ा महंगा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹2 लाख का जुर्माना लगाया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इसी मामले से जुड़ी पिछली न्यायिक कार्यवाहियों को छिपाया और यह गलत घोषणा की कि इससे पहले कोई PIL या रिट याचिका दाखिल नहीं की गई थी।

    यह आदेश चीफ़ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने दिया।

    मामला बरेली के मोहनपुर ठिरिया स्थित नगर निगम के बूचड़खाने के संचालन के लिए वर्ष 2015 में Marya Frozen Agro Food Products Pvt. Ltd. के पक्ष में दिए गए टेंडर से जुड़ा था। याचिकाकर्ता शैलेश सिंह, जिन्होंने खुद को जनहितैषी नागरिक और खोजी पत्रकार बताया, ने टेंडर को चुनौती देते हुए नए सिरे से टेंडर कराने की मांग की थी।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट को पता चला कि याचिकाकर्ता इससे पहले भी इसी विषय से संबंधित PIL और NGT की कार्यवाहियां दाखिल कर चुका था। वर्ष 2024 की एक PIL वापस ले ली गई थी, जबकि दूसरी में हाईकोर्ट ने NGT का रुख करने की स्वतंत्रता दी थी। इसके बाद NGT में भी कार्यवाही शुरू की गई और 2025 में एक अन्य Original Application दाखिल की गई, जो लंबित थी।

    कोर्ट ने कहा कि इन सभी कार्यवाहियों का वर्तमान PIL में कोई खुलासा नहीं किया गया। इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने शपथपत्र में यह घोषणा की कि उसने कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं छिपाया है और पहले कोई PIL या रिट याचिका दाखिल नहीं की गई है। हाईकोर्ट ने इस घोषणा को “apparently false” बताया।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता प्रतिवादी कंपनी के प्रतिस्पर्धियों के इशारे पर प्रॉक्सी क्षमता में काम करता हुआ प्रतीत होता है। अदालत ने दोहराया कि PIL का इस्तेमाल व्यक्तिगत लाभ, निजी मुनाफे या किसी छिपे हुए उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता।

    सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति अदालत के सामने पूरे और सही तथ्यों के साथ आए। महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

    हाईकोर्ट ने PIL को “कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” बताते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर ₹2 लाख हाईकोर्ट की लीगल सर्विसेज कमेटी में जमा करने का निर्देश दिया। राशि जमा न करने पर इसे भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूलने की कार्रवाई की जा सकेगी।

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    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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