इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के गुज़ारा-भत्ते में हर साल 10% बढ़ोतरी के फ़ैमिली कोर्ट के आदेश की तारीफ़ की, कहा- नई सोच

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के गुज़ारा-भत्ते में हर साल 10% बढ़ोतरी के फ़ैमिली कोर्ट के आदेश की तारीफ़ की, कहा- नई सोच

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पत्नी के मासिक अंतरिम गुज़ारा-भत्ते में हर साल 10% बढ़ोतरी का प्रावधान था। कोर्ट ने इस सोच को "नई सोच" (इनोवेटिव थॉट) बताया।

    जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की बेंच ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह "बहुत हैरानी की बात" है कि हाई कोर्ट को ऐसा नया विचार पहले नहीं आया।

    बेंच ने तर्क दिया कि महंगाई हर साल लगभग 10% बढ़ रही है। अगर गुज़ारा-भत्ते की रकम तय रहती है, तो आश्रित पत्नी और बच्चों को समय के साथ अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में मुश्किल होगी।

    इस तरह कोर्ट ने पति द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज की। पति ने प्रयागराज के फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे गुज़ारा-भत्ते की अर्ज़ी की तारीख़ से ₹3,000 प्रति माह और फ़ैसले की तारीख़ से ₹4,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया गया। साथ ही गुज़ारा-भत्ते की रकम में हर साल 10% बढ़ोतरी का प्रावधान भी है।

    पति ने वैवाहिक रिश्ते या पत्नी की अपनी आजीविका कमाने में असमर्थता के बारे में फ़ैमिली कोर्ट के निष्कर्षों को चुनौती नहीं दी। उसने विशेष रूप से गुज़ारा-भत्ते में सालाना 10% बढ़ोतरी को चुनौती दी और तर्क दिया कि यह कानूनी रूप से सही नहीं है।

    पत्नी और राज्य ने इस चुनौती का विरोध करते हुए कहा कि सालाना बढ़ोतरी से गुज़ारा-भत्ता बढ़ाने के लिए बार-बार कानूनी कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, खासकर तब जब बहुत सारे मामले पहले से ही लंबित हैं।

    यह तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि यह पत्नी और बच्चों को गुज़ारा-भत्ता बढ़ाने के लिए एक और अर्ज़ी दायर करने से रोकने का नया तरीका देता है।

    विपक्षी पक्षों के तर्कों से सहमत होते हुए हाईकोर्ट को फ़ैमिली कोर्ट के नज़रिए में दखल देने का कोई कारण नहीं मिला।

    कोर्ट ने कहा कि ₹4,000 प्रति माह की रकम "शायद केवल न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें ही पूरी कर पाएगी" और यह भी नोट किया कि महंगाई हर साल लगभग 10% बढ़ रही है।

    कोर्ट ने कहा कि अगर गुज़ारा-भत्ते की रकम तय रहती है तो आश्रित पत्नी और बच्चों को समय के साथ अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में मुश्किल होगी।

    फ़ैमिली कोर्ट के नज़रिए को 'नया और अनोखा' बताते हुए कोर्ट ने कहा:

    "यह बहुत हैरानी की बात है कि ऐसा नया और अनोखा विचार इस कोर्ट के मन में नहीं आया। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा उठाए गए कदमों का स्वागत और तारीफ़ की जानी चाहिए।"

    इसके बाद कोर्ट ने क्रिमिनल रिविज़न याचिका को खारिज कर दिया और मेंटेनेंस (गुज़ारा-भत्ता) में हर साल 10% की बढ़ोतरी करने के फ़ैमिली कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार किया।

    Case Title : Rakesh Kumar vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 778

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story