उचित समय का नोटिस दिए बिना जमीन का अस्थायी अधिग्रहण नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रद्द किए अधिग्रहण आदेश

Amir Ahmad

25 Aug 2026 5:01 PM IST

  • उचित समय का नोटिस दिए बिना जमीन का अस्थायी अधिग्रहण नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रद्द किए अधिग्रहण आदेश

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 81 के तहत किसी जमीन का अस्थायी अधिग्रहण उचित समय पहले नोटिस दिए बिना नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की तय प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति को उसकी जमीन के इस्तेमाल से वंचित नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस रविंद्र मैठाणी ने मेसर्स डेक्कन चार्टर्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

    कंपनी श्री हेमकुंड साहिबजी हेलीकॉप्टर यात्रा के लिए हेलीपैड का संचालन कर रही थी। राज्य सरकार ने 23 मई 2024 को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत इस हेलीपैड का अस्थायी अधिग्रहण कर लिया। याचिकाकर्ता ने इसी कार्रवाई को चुनौती दी।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हेलीपैड के अधिग्रहण में कोई सार्वजनिक उद्देश्य नहीं था और अधिकारियों ने कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना अपने अधिकार का इस्तेमाल किया।

    यह भी कहा गया कि अधिग्रहण से पहले कोई वैधानिक नोटिस नहीं दिया गया और इस तरह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन हुआ।

    हाईकोर्ट ने सबसे पहले माना कि याचिकाकर्ता 2013 के कानून की धारा 3(एक्स) के तहत "हितबद्ध व्यक्ति" है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि संबंधित पट्टा विलेख पंजीकृत नहीं था, लेकिन हेलीपैड के कब्जे से जुड़े उद्देश्य के लिए वह स्वीकार्य है। कोर्ट ने इसे सहायक उद्देश्य माना।

    जस्टिस रविंद्र मैठाणी ने कहा कि जब कानून किसी काम को किसी निश्चित तरीके से करने का प्रावधान करता है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए और किसी दूसरे तरीके से नहीं।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति को उसकी अपनी जमीन के इस्तेमाल से वंचित नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने माना कि नोटिस में हर विवरण देना जरूरी नहीं है, लेकिन अस्थायी अधिग्रहण से पहले नोटिस देना अनिवार्य है। 2013 के कानून की धारा 81(2) के तहत जिलाधिकारी को संबंधित जमीन में हितबद्ध व्यक्ति को लिखित नोटिस देना होता है। इसमें जमीन किस उद्देश्य से चाहिए, कितनी अवधि के लिए चाहिए और जमीन से कौन-सी सामग्री ली जानी है, जैसी जानकारी दी जानी जरूरी है।

    23 मई 2024 के अधिग्रहण के संबंध में कोर्ट ने पाया कि धारा 81(2) के अनुसार कोई नोटिस नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि यूकाडा की ओर से किशोर सिंह पंवार को भेजा गया पत्र भी कानून में निर्धारित शर्तों के अनुरूप नहीं था।

    कोर्ट ने नोटिस की अवधि को लेकर भी गंभीर सवाल उठाया। संबंधित अधिकारी की ओर से 21 मई 2024 को दोपहर 12 बजे तक जवाब मांगा गया था, जबकि हेलीपैड का अस्थायी अधिग्रहण 23 मई को कर लिया गया।

    कोर्ट ने सवाल किया,

    "क्या किसी की जमीन को 24 घंटे के नोटिस पर अधिग्रहित किया जा सकता है? क्या यह किसी व्यक्ति पर अपनी सहमति देने के लिए दबाव डालना नहीं है?"

    27 जून 2025 के अधिग्रहण के मामले में भी कोर्ट ने पाया कि कार्रवाई से पहले कोई नोटिस नहीं दिया गया। अधिकारियों ने 28 जून को यह जानकारी दी कि हेलीपैड को 27 जून को ही अस्थायी रूप से अधिग्रहित कर लिया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि अधिग्रहण के बाद दी गई सूचना धारा 81(2) का अनुपालन नहीं मानी जा सकती, क्योंकि नोटिस अधिग्रहण से पहले दिया जाना जरूरी था।

    इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार कर लीं और हेलीपैड के अस्थायी अधिग्रहण के दोनों आदेश रद्द कर दिए।

    कोर्ट ने चमोली के जिलाधिकारी को हेलीपैड का नियंत्रण और कब्जा वापस याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश दिया।

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