फर्जी आधार कार्ड और जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO आरोपी को जमानत से किया इनकार

  • फर्जी आधार कार्ड और जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO आरोपी को जमानत से किया इनकार

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य गहरे दबाव के तहत जबरन धर्म परिवर्तन के सुनियोजित प्रयास की ओर संकेत करते हैं। कोर्ट ने कथित तौर पर फर्जी नाम से बनाए गए आधार कार्ड को भी गंभीरता से लिया और कहा कि इससे अपराध में आरोपी की संलिप्तता की सीमा का संकेत मिलता है।

    जस्टिस राकेश थपलियाल ने आरोपी की पहली जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 और 70 तथा POCSO Act की धारा 5(एल)(एन)/6 के तहत मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद उसके और सह-आरोपी के खिलाफ BNS और POCSO Act के अलावा SC/ST Act की धारा 3(2)(v) तथा धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 5 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया।

    आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसे झूठा फंसाया गया। बचाव पक्ष ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान पीड़िता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया और आरोपों से इनकार किया। यह भी कहा गया कि यदि दोनों के बीच कोई संबंध था तो वह सहमति से था। आरोपी ने फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सैंपल में जीवित या मृत शुक्राणु नहीं मिले। उसने सह-आरोपी को मिली जमानत के आधार पर समानता का लाभ देने की मांग भी की। आरोपी के मई 2025 से हिरासत में होने और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना नहीं होने का भी हवाला दिया गया।

    राज्य ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता नाबालिग है, इसलिए POCSO Act के तहत उसकी कथित सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है। राज्य ने FSL रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसके अनुसार पीड़िता के योनि स्वैब से मिले मिश्रित DNA सैंपल का मिलान पीड़िता और आरोपी के ब्लड सैंपल के DNA से हुआ है।

    हाईकोर्ट ने शुक्राणु नहीं मिलने की दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि शुक्राणु की अनुपस्थिति से यौन हमले की संभावना समाप्त नहीं होती, क्योंकि मेडिकल कारणों या यौन हमले की प्रकृति के कारण वीर्य में शुक्राणु नहीं भी हो सकते। कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि पीड़िता के योनि स्वैब में आरोपी का DNA मिलना शारीरिक संपर्क का वैज्ञानिक पुष्टिकरण प्रदान करता है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पीड़िता की उम्र नाबालिग साबित हो जाती है तो सहमति से यौन संबंध की दलील का POCSO Act के तहत कोई महत्व नहीं रह जाता। पीड़िता द्वारा बाद में आरोपों से इनकार किए जाने की दलील पर भी कोर्ट ने कहा कि इससे आरोपी को अपराध से जोड़ने वाले वैज्ञानिक साक्ष्य समाप्त नहीं हो जाते। कोर्ट ने कहा कि गवाह का पक्षद्रोही होना ट्रायल के दौरान अंतिम रूप से तय किया जाने वाला मुद्दा है और मजबूत फॉरेंसिक साक्ष्य मौजूद होने पर यह जमानत का आधार नहीं बन सकता।

    सह-आरोपी को मिली जमानत के आधार पर समानता की मांग भी कोर्ट ने खारिज की। कोर्ट ने कहा कि समानता का लाभ अधिकार के तौर पर नहीं मांगा जा सकता और दोनों आरोपियों के खिलाफ आरोपों में कुछ अंतर है। कोर्ट के अनुसार मौजूदा आरोपी ने कथित धर्म परिवर्तन की आड़ में शारीरिक हमले में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

    कोर्ट ने फर्जी आधार कार्ड के आरोप को भी महत्वपूर्ण माना। राज्य के अनुसार, आरोपी और सह-आरोपी ने पीड़िता को फंसाया और यौन हमले में सक्रिय भूमिका निभाई। जांच में “बिसारा” नाम से कथित तौर पर बनाया गया फर्जी आधार कार्ड भी बरामद हुआ, जिसे जबरन धर्म परिवर्तन की पूर्व नियोजित योजना से जोड़ा गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य “गहरे दबाव के तहत जबरन धर्म परिवर्तन के सुनियोजित प्रयास का मामला दिखाते हैं। कोर्ट ने फर्जी नाम से आधार कार्ड बनाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि यह इस बात का संकेत देता है कि अपराध में आरोपी किस हद तक शामिल था।

    इन परिस्थितियों में कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का कोई उचित आधार नहीं पाया और जमानत याचिका खारिज की। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट इस आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना मामले की सुनवाई और ट्रायल आगे बढ़ाएगा।

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story