बाल संरक्षण का मतलब किशोरावस्था को अपराध बनाना नहीं: 17 वर्षीय लड़की और 21 वर्षीय युवक के संबंध पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

Amir Ahmad

19 Aug 2026 3:15 PM IST

  • बाल संरक्षण का मतलब किशोरावस्था को अपराध बनाना नहीं: 17 वर्षीय लड़की और 21 वर्षीय युवक के संबंध पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 17 वर्षीय लड़की और करीब 21 वर्षीय युवक के बीच प्रेम संबंध से जुड़े मामले में POCSO Act के तहत दर्ज FIR और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि बाल संरक्षण का उद्देश्य किशोरावस्था को अपराध की श्रेणी में डालना नहीं हो सकता।

    जस्टिस आलोक महरा ने कहा कि 17 वर्षीय लड़की और 21 वर्षीय युवक के बीच सहमति से बने संबंधों को यौन हमले के बराबर मानना महत्वपूर्ण अंतर को खत्म करता है और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत स्पष्ट मनमानी की स्थिति पैदा करता है।

    अदालत रामनगर थाने, जिला नैनीताल में दर्ज FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। प्राथमिकी शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 140(3) के तहत दर्ज की गई।

    जांच के दौरान BNS की धारा 137(2), 84 और 64(2)(एम) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(एल) और 6 भी जोड़ी गई थीं।

    मामले के अनुसार घटना के समय लड़की की उम्र 17 वर्ष दो महीने थी, जबकि याचिकाकर्ता की उम्र करीब 22 वर्ष बताई गई। दोनों के बीच एक वर्ष से अधिक समय से प्रेम संबंध है। लड़की अपने माता-पिता को बताए बिना घर से चली गई, जिसके बाद कुछ गलतफहमी के कारण FIR दर्ज कराई गई।

    याचिका लंबित रहने के दौरान दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया। समझौते से संबंधित आवेदन दोनों पक्षों के वकीलों ने संयुक्त रूप से पेश किया और उनके शपथपत्र भी अदालत के समक्ष रखे गए।

    लड़की स्वयं अदालत में पेश हुई और उसने बताया कि वह और याचिकाकर्ता एक-दूसरे से प्रेम करते हैं तथा बालिग होने के बाद विवाह करना चाहते हैं। उसने यह भी स्पष्ट किया कि उनके संबंध में किसी तरह का बल, दबाव या गलत प्रस्तुतीकरण नहीं था।

    हाईकोर्ट ने लड़की की उम्र, उसके बयान, दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे प्रेम संबंध और शिकायतकर्ता तथा लड़की की ओर से आगे मुकदमा नहीं चलाने की इच्छा को महत्वपूर्ण माना।

    अदालत ने यह भी कहा कि FIR कुछ गलतफहमी के कारण दर्ज हुई प्रतीत होती है और यह दो लोगों के प्रेम संबंध का मामला है, जिसमें उनका भविष्य भी जुड़ा हुआ है।

    अदालत ने कहा कि यदि आपराधिक कार्यवाही जारी रहती है तो आरोपी को गंभीर उत्पीड़न, पूर्वाग्रह और अन्याय का सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगी।

    जस्टिस आलोक महरा ने कहा,

    “बाल संरक्षण का मतलब किशोरावस्था को अपराध बनाना नहीं है।”

    कोर्ट ने यह भी कहा कि 17 वर्षीय और 21 वर्षीय व्यक्ति के बीच सहमति से बने संबंधों को यौन हमले के समान मानना दोनों स्थितियों के बीच मौजूद महत्वपूर्ण अंतर को खत्म कर देता है और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत स्पष्ट मनमानी पैदा करता है।

    अदालत ने कहा कि मामले में लड़की ने स्वयं स्वीकार किया है कि संबंधों में बल, दबाव या गलत प्रस्तुतीकरण नहीं था। इन परिस्थितियों को देखते हुए आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

    कोर्ट ने समझौते के महत्व पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि दो पक्षों के बीच विवाद का समाधान हो गया तो अदालत को उस समझौते को प्रभावी बनाने पर तत्काल ध्यान देना चाहिए, जब तक कि समझौता कानून और समाज की वैध व्यवस्था के विरुद्ध न हो।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। चूंकि याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में था, अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

    इसके साथ ही दोनों पक्षों की ओर से पेश समझौते से संबंधित आवेदन का भी निस्तारण कर दिया गया।

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