कानूनी योजना के तहत पुनर्वास दंडात्मक नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती के निवासियों को जारी बेदखली नोटिस को सही ठहराया

Shahadat

9 April 2026 8:40 AM IST

  • कानूनी योजना के तहत पुनर्वास दंडात्मक नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती के निवासियों को जारी बेदखली नोटिस को सही ठहराया

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि देहरादून में रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती के निवासियों को दूसरी जगह बसाने के लिए अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई, जो 'उत्तराखंड शहरी स्थानीय निकाय और प्राधिकरण (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2018' के तहत की गई, उसे गैर-कानूनी या दंडात्मक नहीं कहा जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि जब निवासियों को एक कानूनी योजना के तहत किसी दूसरी जगह (वैकल्पिक आवास) पर बसाया जा रहा हो तो ऐसी कार्रवाई अधिनियम के उद्देश्य के अनुरूप ही मानी जाएगी। इसी आधार पर कोर्ट ने निवासियों को जारी किए गए बेदखली नोटिस को चुनौती देने वाली कई रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।

    जस्टिस पंकज पुरोहित कई रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जिनमें 21.11.2025 को जारी एक बेदखली नोटिस और उसके बाद की उस कार्रवाई को एक साथ चुनौती दी गई, जिसमें निवासियों को अपने घरों को खाली करके पुनर्वास योजनाओं के तहत आवंटित फ्लैटों में जाने का निर्देश दिया गया।

    याचिकाकर्ताओं, जो रिस्पना नदी के किनारे स्थित 'काठबंगला बस्ती' के निवासी हैं, उन्होंने बेदखली नोटिस और उसके बाद 15.02.2026 को उनके घरों पर चिपकाए गए बिना हस्ताक्षर और बिना मुहर वाले नोटिस को चुनौती दी। इस नोटिस में उन्हें बहुत कम समय के भीतर घर खाली करने का निर्देश दिया गया। ऐसा न करने पर उनके घरों को गिराने की धमकी दी गई।

    उन्होंने दावा किया कि वे 'उत्तराखंड शहरी स्थानीय निकाय और प्राधिकरण (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2018' के तहत निर्धारित कानूनी कट-ऑफ तारीख से पहले से ही इस इलाके में रह रहे हैं। इसलिए वे बेदखली या किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा पाने के हकदार हैं। यह भी कहा गया कि ये निवासी, जिनमें से ज़्यादातर लोग दिहाड़ी मज़दूरी और अनौपचारिक कामों से जुड़े हैं, अपने घरों पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं, क्योंकि यही उनके रहने और रोज़ी-रोटी का एकमात्र ज़रिया है।

    याचिकाकर्ताओं ने आगे यह तर्क दिया कि यह विवादित कार्रवाई मनमानी थी और 'उत्तराखंड राज्य के शहरी स्थानीय निकायों में स्थित झुग्गी-झोपड़ियों के सुधार, नियमितीकरण, पुनर्वास, पुनर्स्थापन और अतिक्रमण की रोकथाम अधिनियम, 2016' और 2018 के अधिनियम के तहत निर्धारित कानूनी ढांचे का उल्लंघन करती है।

    यह भी तर्क दिया गया कि पुनर्वास के लिए कोई व्यापक नीति सामने नहीं रखी गई, कोई सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण नहीं किया गया और निवासियों को दूसरी जगह बसाने के संबंध में उनसे कोई सलाह-मशविरा भी नहीं किया गया। यह भी कहा गया कि यह पूरी प्रक्रिया "अनावश्यक जल्दबाज़ी" में की जा रही है। इसमें केवल कुछ ही परिवारों को दूसरी जगह बसाने के लिए चुना गया। याचिकाकर्ताओं ने आगे यह तर्क दिया कि बेदखली के नोटिस पर आपत्तियाँ दर्ज कराने के बावजूद, उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए कोई आदेश या सूचना जारी नहीं की गई।

    इसके विपरीत राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों के अनुपालन में की जा रही थी, विशेष रूप से 'निरंजन बागची बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य' मामले में दिए गए निर्देशों के अनुसार। यह प्रस्तुत किया गया कि निवासियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा रही थी, बल्कि उन्हें पुनर्वास योजनाओं के तहत निर्मित फ्लैट आवंटित किए जा रहे थे।

    आगे यह भी प्रस्तुत किया गया कि इस कार्रवाई का उद्देश्य निवासियों को नदी के तल वाले क्षेत्र से हटाकर दूसरी जगह बसाना था, जहां अचानक बाढ़ या प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में उनके जीवन को खतरा हो सकता था।

    अदालत ने 'उत्तराखंड शहरी स्थानीय निकाय और प्राधिकरण (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2018' के उद्देश्य और उसकी रूपरेखा की जांच की। साथ ही यह पाया कि यह कानून शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपड़ियों की समस्या को पुनर्वास और नियोजित विकास के माध्यम से हल करने के लिए बनाया गया।

    इस संदर्भ में, अदालत ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता एक सूखे नदी तल पर रह रहे थे, और संबंधित अधिकारी उन्हें वैकल्पिक आवास में पुनर्वासित करके इस कानून के उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास कर रहे थे।

    अदालत ने अपने फैसले में कहा,

    "दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री की जांच करने के बाद—विशेष रूप से 'उत्तराखंड शहरी स्थानीय निकाय और प्राधिकरण (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2018' के उद्देश्यों और कारणों तथा उक्त अधिनियम की धारा 2(d) का अवलोकन करने के बाद—यह अदालत इस सुविचारित निष्कर्ष पर पहुंची है कि उपर्युक्त अधिनियम उत्तराखंड के सभी शहरी निकायों में स्थित झुग्गी-झोपड़ियों के पुनर्वास के उद्देश्य से बनाया गया। प्रतिवादी-अधिकारी, विवादित नोटिस के माध्यम से उन याचिकाकर्ताओं को पुनर्वासित करके इस कानून के उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं, जो सूखे नदी तल पर रह रहे हैं और जिन पर अचानक बाढ़ या किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में खतरा मंडरा रहा है। याचिकाकर्ताओं के वकील का यह तर्क भी पूरी तरह से बेबुनियाद है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है, क्योंकि सरकार द्वारा याचिकाकर्ताओं को उनके पुनर्वास के लिए पहले ही उपयुक्त फ्लैट आवंटित किए जा चुके हैं।"

    यह मानते हुए कि इन रिट याचिकाओं में कोई दम नहीं था (अर्थात वे गुण-दोष के आधार पर निरर्थक थीं), हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं को, साथ ही इनसे जुड़े अन्य सभी मामलों को भी खारिज कर दिया।

    Case Name: Rajeshwari Yadav Gupta v State of Uttarakhand and others

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