छात्र को नशे से रोकने और अनुशासन बनाए रखने के लिए डांटने पर शिक्षकों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: उड़ीसा हाईकोर्ट
Praveen Mishra
15 Oct 2026 6:14 PM IST

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी छात्र को अनुशासन बनाए रखने के लिए डांटना या नशे से दूर रहने की चेतावनी देना, अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है। यदि शिक्षकों का कोई आपराधिक इरादा नहीं था और उन्होंने छात्र को आत्महत्या के लिए उकसाया या जानबूझकर सहायता नहीं की, तो केवल छात्र की आत्महत्या के दुखद परिणाम के आधार पर उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस राधा कृष्ण पटनायक की पीठ ने इस टिप्पणी के साथ स्कूल के शिक्षकों और हॉस्टल वार्डन के खिलाफ संज्ञान लेने के निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।
मामले में चंपुआ के उप-मंडलीय न्यायिक मजिस्ट्रेट (SDJM) ने शिक्षकों और वार्डन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 107 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 3(5) (साझा मंशा) के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था।
क्या है मामला?
यह मामला 16 वर्षीय छात्र की आत्महत्या से जुड़ा है। आरोप था कि छात्र ने हॉस्टल की इमारत की चौथी मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी थी।
मामले के अनुसार, स्कूल के शिक्षकों ने मृतक छात्र सहित कुछ विद्यार्थियों को 'डेंड्राइट' नामक पदार्थ का सेवन करने के बाद नशे की हालत में पकड़ा था। इसके बाद शिक्षकों ने उन्हें फटकार लगाई और घटना की जानकारी उनके अभिभावकों को देने की चेतावनी दी।
आरोप लगाया गया कि इस चेतावनी से छात्र घबरा गया और डर तथा शर्मिंदगी के कारण उसने हॉस्टल की चौथी मंजिल से छलांग लगा दी।
इसके बाद शिक्षकों और वार्डन के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने सहित अन्य आरोपों में कार्रवाई की गई।
शिक्षकों ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। उनका तर्क था कि छात्रों को फटकारने का उद्देश्य केवल स्कूल में अनुशासन बनाए रखना था। उनका छात्र को परेशान करने या उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई इरादा नहीं था।
केवल डांटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: हाईकोर्ट
जस्टिस राधा कृष्ण पटनायक ने कहा कि सामान्य चेतावनी देने में आपराधिक मंशा नहीं होती। यदि कोई छात्र अत्यधिक संवेदनशील है, तो सामान्य अनुशासनात्मक कार्रवाई के ऐसे दुखद परिणाम के लिए शिक्षक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जिसकी एक सामान्य व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि संबंधित शिक्षकों और वार्डन की मृतक छात्र की मौत में कोई प्रत्यक्ष भूमिका सामने नहीं आई, जिसके आधार पर उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने का जिम्मेदार ठहराया जा सके।
पीठ ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाने के लिए ऐसा कृत्य या चूक दिखाना आवश्यक है, जिससे आत्महत्या के लिए उकसाया गया हो या उसमें सहायता की गई हो।
इसके लिए कथित उत्पीड़न और छात्र की मृत्यु के बीच निकट संबंध स्थापित होना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि प्रथम दृष्टया ऐसे साक्ष्य हों, जो आरोपी की आवश्यक आपराधिक मंशा को दर्शाते हों।
आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में क्या जरूरी है?
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों—V.P. Singh v. State of Punjab & Ors., 2022 LiveLaw (SC) 994 और Thangavel v. The State, 2025 Live law (SC) 659—का हवाला दिया।
इन फैसलों के सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए अदालत ने कहा कि किसी छात्र को अनुशासनहीनता के लिए निलंबित करना, डांटना या संस्थागत अनुशासन लागू करना और उसके बाद छात्र की आत्महत्या हो जाना, मात्र इसी आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता।
अदालत के अनुसार, इस अपराध के लिए सक्रिय रूप से उकसाने, जानबूझकर उकसावा देने या आत्महत्या में जानबूझकर सहायता करने का प्रथम दृष्टया साक्ष्य आवश्यक है।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि शिक्षक के खिलाफ बार-बार उत्पीड़न करने या जानबूझकर अपमानित करने के विशिष्ट आरोप नहीं हैं, तो अनुशासन बनाए रखने के लिए की गई सामान्य फटकार को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।
शिक्षकों के खिलाफ संज्ञान का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं था, जिससे यह संकेत मिले कि याचिकाकर्ता शिक्षक मृतक छात्र को नियमित रूप से परेशान करते थे या उन्होंने जानबूझकर उसे आत्महत्या के लिए उकसाया था।
अदालत ने कहा कि केवल अनुशासन बनाए रखने के लिए छात्र को फटकारने के आधार पर शिक्षकों और वार्डन के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोपियों के खिलाफ अपराध का संज्ञान लेने के आदेश को रद्द कर दिया।
फैसले का महत्व: इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्र की आत्महत्या के बाद शिक्षकों की सामान्य अनुशासनात्मक कार्रवाई को स्वतः आपराधिक उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता। हालांकि, जहां जानबूझकर उत्पीड़न, सक्रिय उकसावे या आत्महत्या में सहायता के पर्याप्त साक्ष्य हों, वहां मामला अलग हो सकता है।

