वकीलों की हड़ताल पर तेलंगाना हाईकोर्ट सख्त, कहा- कोर्ट आने वाले वकील के साथ मारपीट स्वीकार्य नहीं

  • वकीलों की हड़ताल पर तेलंगाना हाईकोर्ट सख्त, कहा- कोर्ट आने वाले वकील के साथ मारपीट स्वीकार्य नहीं

    तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि बार (वकीलों) और/या बेंच (जजों) की गरिमा, ईमानदारी या आज़ादी से जुड़े बहुत ही खास मामलों में, कुछ शर्तों के साथ, वकीलों को एक दिन की हड़ताल या कोर्ट के काम से दूर रहने की इजाज़त दी जा सकती है।

    हालांकि, इस छूट का मतलब यह नहीं है कि जो वकील कोर्ट आना चाहते हैं, उन्हें डराया-धमकाया जाए, रोका जाए या उनके साथ मारपीट की जाए।

    जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी ने यह बात मेट्रोपॉलिटन क्रिमिनल कोर्ट बार एसोसिएशन, नामपल्ली के पदाधिकारियों के खिलाफ अवमानना ​​का मामला खारिज करते हुए कही। यह मामला एक दिन के बहिष्कार के आह्वान और इस आरोप से जुड़ा था कि एक वकील को कोर्ट परिसर में घुसने से रोका गया और उसके साथ मारपीट की गई।

    कोर्ट ने अवमानना ​​मामले में आगे बढ़ने से इनकार किया। कोर्ट ने घटना से जुड़े विवादित तथ्यों, लंबित आपराधिक कार्यवाही और प्रतिवादियों द्वारा जानबूझकर आदेश न मानने को साबित करने वाले पर्याप्त सबूतों की कमी का हवाला दिया।

    कोर्ट ने फिर से कहा कि वकीलों को हड़ताल करने या कोर्ट के बहिष्कार का आह्वान करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी वकील को ऐसी हड़ताल या बहिष्कार में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि सुप्रीम कोर्ट ने बार और/या बेंच की गरिमा, ईमानदारी और आज़ादी से जुड़े बहुत ही खास मामलों में एक सीमित छूट को मान्यता दी, जहां एक दिन से ज़्यादा न होने वाली हड़ताल या काम से दूर रहने पर विचार किया जा सकता है।

    यह छूट सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तों के अधीन है। हाईकोर्ट ने कहा कि खास तौर पर कोर्ट के काम से दूर रहने का फैसला करने से पहले बार के अध्यक्ष को चीफ जस्टिस या जिला जज (जैसा भी मामला हो) से सलाह लेनी होगी और संबंधित न्यायिक अधिकारी का फैसला बार के लिए अंतिम और बाध्यकारी होगा।

    कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि भले ही परिस्थितियां इस सीमित छूट के दायरे में आती हों, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी ऐसे वकील के खिलाफ ज़बरदस्ती, डराने-धमकाने, रोकने या शारीरिक मारपीट को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता, जो कोर्ट आना चाहता है।

    “इस कोर्ट के सामने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट ने 16.06.2025 के प्रस्ताव को पास करने से पहले संबंधित डिस्ट्रिक्ट जज (यानी इस मामले में संबंधित मेट्रोपॉलिटन सेशंस जज) से सलाह ली थी। इसलिए रेस्पॉन्डेंट्स प्रस्ताव के तहत किए गए हर काम को सिर्फ़ इस आधार पर सही नहीं ठहरा सकते कि विरोध प्रदर्शन एक दिन तक सीमित था या यह किसी वकील के समर्थन में किया गया। भले ही यह मान लिया जाए कि प्रस्ताव की वजह बनी परिस्थितियां 'एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल' मामले में मानी गई सीमित अपवाद (Exception) के दायरे में आती हैं। फिर भी वह अपवाद केवल कोर्ट के काम से सीमित दूरी बनाने तक ही लागू होगा। इसमें किसी ऐसे वकील को डराना-धमकाना, मजबूर करना, बाधा डालना या शारीरिक हमला करना शामिल नहीं होगा जो कोर्ट में आना चाहता है... कानूनी स्थिति बिल्कुल साफ है कि 'एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल' मामले (जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया) में माना गया सीमित अपवाद किसी बार एसोसिएशन या उसके पदाधिकारियों को किसी वकील को उसके पेशेवर काम करने से रोकने या बॉयकॉट के आह्वान को न मानने पर उसे किसी बुरे नतीजे का सामना करने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं देता है।"

    हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया कि उसके नज़रिए को बार एसोसिएशन के बॉयकॉट के आह्वान के बावजूद कोर्ट में आने की कोशिश कर रहे वकील पर हमले, डराने-धमकाने, मजबूर करने या बाधा डालने के किसी भी काम को मंज़ूरी देने, नज़रअंदाज़ करने या सही ठहराने के तौर पर नहीं समझा जाना चाहिए।

    यह मामला 16 जून, 2025 के उस प्रस्ताव से शुरू हुआ, जिसमें एसोसिएशन के सदस्यों से उन वकीलों के समर्थन में कोर्ट के काम से दूर रहने को कहा गया, जिन पर कथित तौर पर हमला हुआ था। खुद पेश हुए याचिकाकर्ता वकील विजय गोपाल ने कहा कि वह एक तय मामले के लिए नामपल्ली कोर्ट कॉम्प्लेक्स गए, लेकिन बॉयकॉट में शामिल होने से इनकार करने पर उन्हें रोका गया और उन पर हमला किया गया। पुलिस ने उनकी शिकायत पर FIR दर्ज की और एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी की शिकायत पर एक काउंटर-FIR भी दर्ज की।

    गोपाल ने एसोसिएशन के पदाधिकारियों के खिलाफ़ अदालत की अवमानना ​​की कार्रवाई की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि वकीलों को बहिष्कार में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और उन्हें अदालत में प्रवेश करने से रोकना वकीलों की हड़ताल पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है।

    प्रतिवादियों ने आरोपों का खंडन किया और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका के प्रमाण के बिना पदाधिकारियों पर सामूहिक रूप से अवमानना ​​की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। उन्होंने घटना से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही की ओर भी इशारा किया।

    हाईकोर्ट ने फिर से स्पष्ट किया कि वकीलों को हड़ताल करने या अदालत के काम का बहिष्कार करने का कोई सामान्य अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शन की एक दिन की अवधि और एकजुटता का घोषित उद्देश्य जबरदस्ती को उचित नहीं ठहरा सकता। यदि प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा कथित बाधा और हमले की बात साबित हो जाती है, तो वे सीमित अपवाद के दायरे से बाहर होंगे।

    हालाँकि, अन्य पदाधिकारियों के खिलाफ़ आरोपों में ऐसे किसी व्यक्तिगत कृत्य की पहचान नहीं की गई, जो अवमानना ​​साबित करने के लिए पर्याप्त हो। कथित हमले पर विवाद है और वह पहले से ही दो आपराधिक मामलों का विषय है। कोर्ट ने अवमानना ​​की समानांतर कार्यवाही में उन विवादित तथ्यों का निर्धारण करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गोपाल बाद में परिसर में प्रवेश करने और उस दिन अपने मामले में शामिल होने में सक्षम है।

    मामले को खारिज करते हुए कोर्ट ने बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि भविष्य के विरोध प्रदर्शन अदालत तक पहुँचने में बाधा न डालें या किसी ऐसे व्यक्ति को नुकसान न पहुंचाएं, जो शामिल होने का विकल्प चुनता है।

    Case Title : Vijay Gopal v. N.V. Ramana Goud & Ors

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