यदि दोनों पक्ष हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन न हों तो विवाह वैध नहीं: तेलंगाना हाइकोर्ट

Amir Ahmad

4 Feb 2026 1:23 PM IST

  • यदि दोनों पक्ष हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन न हों तो विवाह वैध नहीं: तेलंगाना हाइकोर्ट

    तेलंगाना हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में अनुसूचित जनजाति की महिला और अनुसूचित जाति के पुरुष के बीच हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत पंजीकृत विवाह को शून्य घोषित किया।

    हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विवाह के किसी एक पक्ष पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता तो उस अधिनियम के अंतर्गत किया गया विवाह कानूनन टिकाऊ नहीं हो सकता।

    जस्टिस के. लक्ष्मण और जस्टिस वाकिटी रामकृष्ण रेड्डी की खंडपीठ ने अनुसूचित जनजाति की महिला द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें विवाह को शून्य घोषित करने से इंकार किया गया था।

    अपीलकर्ता महिला ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत विवाह विच्छेद की याचिका दायर की थी। उसका आरोप था कि प्रतिवादी ने उसे धमकाकर और दबाव बनाकर विवाह के लिए मजबूर किया तथा बाद में विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत संपन्न और पंजीकृत कराया गया।

    वहीं प्रतिवादी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि विवाह दोनों की सहमति से प्रेम संबंध के आधार पर हुआ था और विवाह के बाद दांपत्य संबंध भी स्थापित हुए।

    फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज की कि महिला जबरन विवाह या क्रूरता को सिद्ध नहीं कर सकी और विवाह को शून्य घोषित करने से इंकार कर दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर महिला ने हाइकोर्ट का रुख किया।

    हाइकोर्ट में अपील के दौरान महिला ने सीधे विवाह की वैधता को ही चुनौती दी। उसका तर्क था कि वह अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा कोई अधिसूचना जारी न की जाए। चूंकि ऐसी कोई अधिसूचना जारी नहीं हुई, इसलिए उनके बीच हुआ कथित विवाह स्वतः ही शून्य है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद तथ्य है कि प्रतिवादी अनुसूचित जाति से और अपीलकर्ता अनुसूचित जनजाति से संबंधित है। यह भी विवादित नहीं है कि विवाह का पंजीकरण हिंदू विवाह अधिनियम के तहत किया गया और इसे मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से संपन्न बताया गया। ऐसे में निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या केवल पंजीकरण या धार्मिक रीति से विवाह संपन्न करने मात्र से उस अधिनियम की वैधता लागू हो सकती है, जबकि एक पक्ष उस अधिनियम के दायरे से बाहर है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों को अधिनियम के दायरे से स्पष्ट रूप से बाहर रखती है, जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा इसे लागू करने की अधिसूचना जारी न की जाए।

    अदालत ने यह भी दर्ज किया कि अपीलकर्ता की जनजाति के संबंध में ऐसी कोई अधिसूचना अस्तित्व में नहीं है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्तिगत कानून की लागूता कानून द्वारा तय होती है न कि पक्षकारों की इच्छा, सहमति या आचरण से। यदि कोई हिंदू ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहता है, जिस पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता तो ऐसे विवाह के लिए विधिसम्मत रास्ता विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत विवाह करना है, जो एक धर्मनिरपेक्ष कानून है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू न होने की स्थिति में केवल पंजीकरण, धार्मिक अनुष्ठान या आपसी सहमति से इस वैधानिक अपवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने यह दलील भी खारिज की कि मंदिर में विवाह होने या हिंदू रीति-रिवाज अपनाने से अधिनियम स्वतः लागू हो जाएगा। हाइकोर्ट ने कहा कि न तो यह दलील दी गई और न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया कि महिला ने जनजातीय परंपराओं को त्याग दिया या वह पूरी तरह हिंदू कानूनों के अधीन आ गई। ऐसे में केवल विवाह समारोह का आयोजन कानूनी रूप से अपर्याप्त है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाद का निपटारा करते समय यह जांच ही नहीं की कि यह अधिनियम महिला पर लागू होता भी है या नहीं। जब किसी अदालत का अधिकार क्षेत्र ही किसी कानून की लागूता पर निर्भर करता हो तो इस प्रश्न की अनदेखी पूरे निर्णय को अधिकार क्षेत्र की दृष्टि से दोषपूर्ण बना देती है।

    इन सभी तथ्यों के आधार पर हाइकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और यह घोषित किया कि संबंधित विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध नहीं है और कानूनन शून्य है।

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