मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा के लिए दिशा-निर्देश तय करेंगे: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
27 Oct 2026 2:19 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर, संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित कुछ दिशा-निर्देश तय करने का संकेत दिया।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह बात तब कही, जब इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट नहीं था। गौरतलब है कि यह बेंच कर्नाटक सरकार की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है। इस अधिसूचना के तहत कर्नाटक मेडिकल काउंसिल में स्थायी पंजीकरण पाने के लिए मेडिकल छात्रों को एक साल की अनिवार्य ग्रामीण सेवा पूरी करना जरूरी है।
पिछली सुनवाइयों में बेंच ने छूट दिए जाने पर सवाल उठाया और पूछा कि निजी संस्थान ग्रामीण भारत में लोगों की सेवा क्यों नहीं करना चाहते। हाल की सुनवाई में, कोर्ट ने सुझाव दिया कि मेडिकल स्टूडेंट्स की अनिवार्य ग्रामीण सेवा के लिए एक समान नीति होनी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने इस तरह की अखिल भारतीय नीति के संबंध में केंद्र सरकार से निर्देश लेने पर सहमति जताई।
आज जब यह मामला सुनवाई के लिए आया तो एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि पोस्ट-ग्रेजुएट छात्रों के लिए रोटेशन के आधार पर अनिवार्य सेवा का नियम है, लेकिन अंडर-ग्रेजुएट स्तर पर ऐसा कोई नियम नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि चूंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए कई राज्यों ने ऐसी अनिवार्य सेवा के लिए बॉन्ड की व्यवस्था लागू की है। भाटी ने बताया कि एक समिति का गठन किया गया, जिसने सिफारिश की है कि सभी राज्य एक समान बॉन्ड व्यवस्था अपना सकते हैं।
इस मामले में 'एमिक्स क्यूरी' (न्यायालय के सहयोगी) के तौर पर मौजूद वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने सुझाव दिया कि अनुच्छेद 21 और राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy) के आधार पर, कानूनी कमियों को दूर करने के लिए उचित दिशा-निर्देश तय किए जाने चाहिए। इसके विपरीत, भाटी ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार इस पर विचार-विमर्श कर सकती है। कोर्ट की ओर से कोई अनिवार्य आदेश नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इसका असर देश भर के संस्थानों पर पड़ेगा।
इस मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि आज वे जो भी फैसला लेंगे, उसका असर भारत में चिकित्सा सहायता के भविष्य पर पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा कि चूंकि केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट नहीं है, इसलिए ऐसा लगता है कि यहां "नीतिगत कमी" (Policy Deficit) है।
उन्होंने कहा:
"जो सुझाव दिया गया, वह कोई अनिवार्य आदेश (Mandate) नहीं है। सिद्धांत के तौर पर क्या नीति-निर्माता और संवैधानिक आवश्यकताएं इस बात से सहमत हैं कि हमारे डॉक्टरों के लिए पूरे भारत के ग्रामीण इलाकों में सेवा देना, हमारे स्वास्थ्य और राष्ट्रीय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए एक जरूरी कदम है या नहीं? असल मुद्दा बस इतना ही है। इसके बाद दूसरा सवाल यह है कि इसे कैसे लागू किया जाए - एक बॉन्ड के रूप में या किसी नियम (Regulation) के जरिए? लेकिन एक सिद्धांत के तौर पर, अभी कोई स्पष्टता नहीं है। आपको इस पर चिकित्सा सचिव या जो भी नीति-निर्माता हैं, उनके साथ विचार-विमर्श करना चाहिए। वरना, संवैधानिक व्याख्या के अनुसार, 'स्वास्थ्य का अधिकार' एक मौलिक अधिकार है और राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह इसे सुनिश्चित करे। आने वाले समय में जब अस्पतालों तक पहुंच का मतलब मुख्य रूप से निजी संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे अस्पतालों तक पहुंच रह जाएगा, तो ग्रामीण इलाकों की जरूरतों को पूरा करने की व्यवस्था पीछे छूट सकती है।"
अंत में कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए टाल दी और केंद्र सरकार से स्पष्ट करने को कहा कि क्या वे कोई नीति बनाने का इरादा रखते हैं और इस प्रक्रिया में वे किनके साथ परामर्श करेंगे।
जस्टिस नरसिम्हा ने सुझाव दिया,
"हम इसके संवैधानिक पहलू को मार्गदर्शक सिद्धांत (Guiding Principle) के रूप में तैयार कर सकते हैं। राज्य सरकार, आयोग (Commission) के साथ परामर्श करके इसे तैयार करेगी।"
यहाँ 'कर्नाटक कंपल्सरी सर्विस ट्रेनिंग बाय कैंडिडेट्स कंप्लीटेड मेडिकल कोर्सेज एक्ट, 2012' और इसके बाद बनाए गए 'कर्नाटक कंपल्सरी सर्विस ट्रेनिंग बाय कैंडिडेट्स कंप्लीटेड मेडिकल कोर्स रूल्स, 2015' पर सवाल उठाए गए।
इस योजना के तहत हर MBBS ग्रेजुएट, हर पोस्ट-ग्रेजुएट (डिप्लोमा या डिग्री धारक), और हर सुपर-स्पेशियलिटी उम्मीदवार - जिसने अपनी पढ़ाई किसी सरकारी विश्वविद्यालय से की हो, या किसी निजी/डीम्ड विश्वविद्यालय में सरकारी सीट पर पढ़ाई की हो - उसके लिए एक साल की अनिवार्य ग्रामीण सार्वजनिक सेवा देना जरूरी है। इस शर्त को पूरा करने के बाद ही 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) जारी किया जाएगा। इसी के आधार पर याचिकाकर्ता कर्नाटक मेडिकल काउंसिल में स्थायी पंजीकरण (Permanent Registration) के लिए पात्र हो सकेगा।
28.07.2023 की अधिसूचना के अनुसार, यह शर्त निजी/डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों पर भी लागू कर दी गई थी।
याचिका में यह तर्क दिया गया कि निजी या डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर दाखिला लेने वाले उम्मीदवार, जो बहुत अधिक खर्च करके अपनी पढ़ाई कर रहे हैं, वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत एक अलग श्रेणी (Intelligible Differentia) में आते हैं। इसलिए, याचिकाकर्ता का तर्क है कि उन पर अनिवार्य सेवा की शर्त लागू नहीं होनी चाहिए।
इसके समर्थन में 'एसोसिएशन ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटी एस्पिरेंट्स रेजिडेंट्स एंड अदर्स बनाम भारत संघ व अन्य' (W.P.(C) No. 376/2018) मामले में अदालत के फैसले का हवाला दिया गया। इस मामले में अदालत ने पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स और सुपर स्पेशलिटी कोर्स में दाखिले के लिए अनिवार्य बॉन्ड (Compulsory Bonds) लागू करने के खिलाफ दी गई चुनौती खारिज की। हालांकि, साथ ही यह भी देखा गया कि कुछ राज्य सरकारों के अनिवार्य बॉन्ड की शर्तें बहुत सख्त हैं। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि भारत सरकार और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षित डॉक्टरों की अनिवार्य सेवा के संबंध में एक समान नीति बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए।
इस आधार पर याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से निम्नलिखित दो निर्देश देने की मांग की:
“'कमिश्नरेट ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर सर्विसेज' को निर्देश देने के लिए 'रिट ऑफ मैंडमस' (Writ of Mandamus) या कोई अन्य उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी किया जाए, ताकि वे याचिकाकर्ताओं को अनिवार्य ग्रामीण सेवा के शपथ-पत्र (Affidavit) की शर्त लगाए बिना आवश्यक एनओसी (NOC) जारी करें।
'कर्नाटक मेडिकल काउंसिल' को निर्देश देने के लिए 'रिट ऑफ मैंडमस' या कोई अन्य उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी किया जाए, ताकि वे याचिकाकर्ताओं का स्थायी पंजीकरण (Permanent Registration) स्वीकार करें।”
Case Number : W.P.(C) No. 332/2024

