पति की मौत की तारीख से ही विधवा को मिलनी चाहिए फ़ैमिली पेंशन: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

8 Sept 2026 9:21 PM IST

  • पति की मौत की तारीख से ही विधवा को मिलनी चाहिए फ़ैमिली पेंशन: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि विधवा को फ़ैमिली पेंशन पाने का अधिकार उसके पति की मौत की तारीख से ही शुरू हो जाता है। इसे उस तारीख तक सीमित नहीं किया जा सकता जब उसने पहली बार सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में अपील की थी, खासकर तब जब फ़ायदा पाने में हुई देरी उसकी अपनी गलती की वजह से न हो।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच एक रेलवे कर्मचारी की विधवा की अपील पर सुनवाई कर रही थी। कर्मचारी की मौत 2000 में नौकरी के दौरान हुई थी। विधवा ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे फ़ैमिली पेंशन तो दी गई थी, लेकिन उसका फ़ायदा 2000 के बजाय 2014 (जब उसने पहली बार CAT में अपील की थी) से ही दिया गया।

    अपीलकर्ता और उसके पति झगड़े के कारण अलग-अलग रह रहे थे और पति की मौत के समय उसे उनकी नौकरी से जुड़ी जानकारी नहीं थी। बाद में पति की मौत के बाद 2001 में उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। जब अपीलकर्ता ने नौकरी से निकाले जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की तो देरी और मौत की तारीखों में अंतर के आधार पर 2012 में उसकी याचिका खारिज कर दी गई। बाद में एक सिविल केस दायर किया गया जिसमें पति की मौत की सही तारीख 12.11.2000 तय की गई। इसके बाद वह CAT के पास गई। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने समय सीमा खत्म होने (टाइम-बार) के आधार पर उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद, वह बॉम्बे हाई कोर्ट गई, जिसने उसे फ़ैमिली पेंशन तो दी, लेकिन सिर्फ़ 2014 से।

    हाईकोर्ट के आदेश से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट गई।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि पति की मौत के तुरंत बाद ही उसे फ़ैमिली पेंशन मिलनी चाहिए। इसे बाद की किसी तारीख तक सीमित नहीं किया जा सकता।

    इसके विपरीत, केंद्र सरकार ने 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम तरसेम सिंह' मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि हाई कोर्ट का बकाया राशि को सीमित करने का फ़ैसला सही था। यह फ़ैसला इस सिद्धांत पर आधारित था कि बार-बार होने वाली गलतियों के लिए मिलने वाली राहत आम तौर पर रिट याचिका दायर करने से पहले के तीन साल तक ही सीमित होती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही 'तरसेम सिंह' मामले में यह तय किया गया कि बकाया राशि (arrears) का भुगतान आम तौर पर रिट याचिका दायर करने से पहले के तीन साल तक ही सीमित होना चाहिए, लेकिन 'एस.के. मस्तान बी बनाम जनरल मैनेजर, साउथ सेंट्रल रेलवे' (जो खास तौर पर एक विधवा के फैमिली पेंशन के दावे से जुड़ा था) के पुराने फैसले में एक अलग राय अपनाई गई, जिस पर 'तरसेम सिंह' मामले में विचार नहीं किया गया।

    'एस.के. मस्तान बी' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह एम्प्लॉयर की ज़िम्मेदारी है कि वह विधवा को बिना कानूनी लड़ाई में उलझाए फैमिली पेंशन का हिसाब करे और उसे दे और इस लाभ से वंचित करना आर्टिकल 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी माना कि विधवा का अनपढ़ होना और संसाधनों की कमी इस बात को सही ठहराती है कि उसे पेंशन "उस तारीख से दी जाए जब वह उसे मिलनी चाहिए थी, यानी उसके पति की मृत्यु की तारीख से।"

    बेंच ने परस्पर विरोधी फैसलों पर लागू होने वाले स्थापित सिद्धांतों को दोहराने के लिए 'डॉ. शाह फैसल बनाम भारत संघ' और 'परवीन कुमार उर्फ ​​परवीन चौहान बनाम हरियाणा राज्य' मामलों का भी सहारा लिया। कोर्ट ने कहा कि समान क्षमता वाली एक कोऑर्डिनेट बेंच मामले को बड़ी बेंच को भेजे बिना विपरीत राय नहीं ले सकती, और जहां बाद का कोई फैसला उसी मुद्दे पर पहले के बाध्यकारी फैसले पर विचार करने में विफल रहता है तो बाद वाला फैसला 'पर इनकुरियम' (कानून की अनदेखी करके लिया गया) माना जाएगा और उसका कोई मिसाल वाला मूल्य (precedential value) नहीं होगा।

    ऊपर बताई गई बातों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा,

    "एस.के. मस्तान बी (ऊपर उल्लिखित) मामला सीधे तौर पर मौजूदा मामले की तरह ही एक विधवा द्वारा फैमिली पेंशन के दावे से जुड़ा है। 'तरसेम सिंह' (ऊपर उल्लिखित) मामले में यह राय अपनाते हुए कि बकाया राशि की वसूली के परिणामी लाभ को हाईकोर्ट द्वारा आम तौर पर रिट याचिका दायर करने की तारीख से पहले के तीन साल की अवधि तक सीमित रखा जाना चाहिए। इस कोर्ट ने 'एस.के. मस्तान बी' (ऊपर उल्लिखित) मामले में अपनी पिछली राय पर विचार नहीं किया।"

    कोर्ट ने माना कि पेंशन एक कीमती अधिकार और संपत्ति है, न कि कोई तोहफ़ा। कोर्ट ने कहा कि इस फ़ायदे को 2014 तक सीमित करने से एक गरीब विधवा के साथ अन्याय होगा, जिसकी देरी में कोई गलती नहीं थी। उसकी मांग को बार-बार मौत की तारीख में अंतर की वजह से रोका गया, जिसे सुलझाने के लिए उसे सिविल केस करना पड़ा।

    बेंच ने कहा,

    "सिर्फ़ यही नहीं कि उनके पति को उनकी मौत के बाद नौकरी से निकाल दिया गया - जो रेलवे बोर्ड के अपने सर्कुलर के हिसाब से गलत था - बल्कि अपील करने वाली महिला की फ़ैमिली पेंशन की मांग को भी उनके दिवंगत पति की मौत की तारीख में अंतर के आधार पर खारिज किया गया। अपील करने वाली महिला को अपने पति की मौत की सही तारीख का ऐलान करवाने के लिए सिविल केस करना पड़ा, जबकि इसके लिए एक कानूनी दस्तावेज़, यानी डेथ सर्टिफ़िकेट, पहले ही उनके पक्ष में जारी किया जा चुका था। इसलिए, रेलवे द्वारा फ़ैमिली पेंशन देने से इनकार करने को चुनौती देने में हुई देरी के लिए अपील करने वाली महिला की कोई गलती नहीं थी।"

    इन बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंज़ूर कर ली और आदेश दिया कि अपील करने वाली महिला अपने पति की मौत की तारीख (12.11.2000) से फ़ैमिली पेंशन पाने की हकदार होगी, साथ ही आदेश के तीन महीने के भीतर सालाना 6% ब्याज भी मिलेगा।

    Case: Maya Banerjee v Union of India & Ors

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