अग्रिम जमानत खारिज करते समय हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट को पहले से तय शर्तों पर नियमित जमानत देने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
31 Oct 2026 8:07 PM IST

सुप्रीम कोर्ट के सामने उड़ीसा हाईकोर्ट का एक आदेश आया, जिसमें हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए उसे नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की सलाह दी। साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह आरोपियों को उन्हीं शर्तों पर रिहा करे, जो हाईकोर्ट ने तय की थीं। इस तरह हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में दखल दिया।
इस तरह की प्रक्रिया पर असहमति जताते हुए जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के लिए यह उचित नहीं है कि वह जमानत की शर्तें तय करके या किसी पक्ष को आगे की कार्रवाई के बारे में सलाह देकर ट्रायल कोर्ट के काम में दखल दे।
कोर्ट ने कहा,
"जब हाईकोर्ट इस नतीजे पर पहुंच गया कि अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता है तो यह तय करना हाईकोर्ट का काम नहीं है कि आगे क्या होगा। हाईकोर्ट ने न केवल प्रतिवादियों को आगे की कार्रवाई के बारे में सलाह दी, बल्कि यह भी तय कर दिया कि ट्रायल कोर्ट उन्हें किन शर्तों पर जमानत देगा।"
सुप्रीम कोर्ट उस शिकायतकर्ता की अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें आरोपियों की अग्रिम जमानत तो खारिज की गई थी, लेकिन उन्हें ट्रायल कोर्ट में नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की सलाह दी गई थी। साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह आरोपियों को उन्हीं शर्तों पर नियमित जमानत दे, जो हाईकोर्ट ने तय की थीं।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट का आदेश अपनी सीमा से बाहर था। कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने असल में ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को अपने हाथ में ले लिया था, जिससे ट्रायल कोर्ट के पास जमानत याचिकाओं पर उनके गुण-दोष और कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से फैसला लेने का कोई मौका ही नहीं बचा।
अदालत ने कहा,
"हाईकोर्ट के सकारात्मक निर्देश, न केवल दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 438 के तहत प्राप्त अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, बल्कि इन्होंने ट्रायल कोर्ट की उस भूमिका को भी पूरी तरह से अपने हाथ में ले लिया, जो प्रतिवादियों द्वारा सही समय पर नियमित जमानत याचिकाएं दायर किए जाने पर ट्रायल कोर्ट को निभानी थी। असल में, इससे ट्रायल कोर्ट के पास ऐसी जमानत याचिकाओं पर उनके गुण-दोष के आधार पर और कानून के अनुसार फैसला लेने का कोई विवेक (Discretion) ही नहीं बचा।"
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट का आदेश आंशिक रूप से रद्द किया गया। इसमें अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) खारिज करने का आदेश तो बरकरार रखा गया, लेकिन जमानत की शर्तें लगाने, आरोपियों के लिए भविष्य की कार्ययोजना तय करने और ट्रायल कोर्ट को आरोपियों को रिहा करने का निर्देश देने वाला हिस्सा रद्द कर दिया गया।
आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण (Surrender) करने का आदेश दिया गया।
अदालत ने आदेश दिया,
"चुनौती दिए गए आदेश के पैराग्राफ 19 में दिए गए निर्देश रद्द किए जाते हैं। हालांकि, प्रतिवादियों की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज करने का आदेश बरकरार रहेगा। इसके परिणामस्वरूप, रायगडा के उप-विभागीय न्यायिक मजिस्ट्रेट (Sub-Divisional Judicial Magistrate) द्वारा 30.01.2026 को पारित आदेश भी रद्द माना जाएगा और प्रतिवादियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। उस समय उनके द्वारा दिए गए जमानत बॉन्ड और ज़मानतदार (Sureties) भी समाप्त माने जाएंगे।"
अदालत ने स्पष्ट किया,
"हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बावजूद, प्रतिवादी कानून के अनुसार सही समय पर और उचित मंच (Forum) के समक्ष राहत की मांग कर सकते हैं; यह आदेश उन्हें ऐसा करने से नहीं रोकता है।"
Case Title : JAGANNATH MANDANGI VERSUS STATE OF ODISHA & ANR. ETC.

