जब टेंडर मंज़ूर करना साफ़ तौर पर NIT की शर्तों के ख़िलाफ़ हो तो कोर्ट दखल दे सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

  • जब टेंडर मंज़ूर करना साफ़ तौर पर NIT की शर्तों के ख़िलाफ़ हो तो कोर्ट दखल दे सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 सितंबर) को कहा कि हालांकि कोर्ट को आम तौर पर टेंडर देने वाली अथॉरिटी की कमर्शियल समझ का सम्मान करना चाहिए, लेकिन यह सम्मान टेंडर की शर्तों की ऐसी व्याख्या तक नहीं बढ़ सकता, जो 'नोटिस इनवाइटिंग टेंडर' (NIT) के ख़िलाफ़ हो या साफ़ तौर पर मनमानी हो।

    जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें 16 करोड़ रुपये से ज़्यादा के कॉन्ट्रैक्ट के तहत 12 महीनों में मंडी परिसर में आने वाले बड़ी संख्या में वाहनों से यूज़र चार्ज वसूलने का काम शामिल था।

    टेंडर के लिए पिछले दो सालों में सरकारी, सेमी-सरकारी या PSU संगठनों में यूज़र चार्ज/पार्किंग फ़ीस वसूलने के सालाना काम को सफलतापूर्वक पूरा करने का अनुभव ज़रूरी है।

    विवाद तब शुरू हुआ, जब टेंडर देने वाली अथॉरिटी ने अपील करने वाले के पशु मेले आयोजित करने के अनुभव को ज़रूरी योग्यता मान लिया और उसे सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाला (H1) मानते हुए उसके पक्ष में 'लेटर ऑफ़ एक्सेप्टेंस' (LoA) जारी किया।

    दूसरे सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाले (H2) ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में अपील करने वाले के पक्ष में LoA जारी किए जाने को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने प्रतिवादी की रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए टेंडर प्रक्रिया में दखल दिया और अपील करने वाले के पक्ष में जारी LoA रद्द किया। हाईकोर्ट ने पाया कि H1 बोली लगाने वाले की टेक्निकल बिड योग्यता के मानदंडों को पूरा नहीं करती थी; इसलिए उसने टेंडर देने वाली अथॉरिटी को कानून के अनुसार योग्य बोली लगाने वाले के पक्ष में LoA जारी करने का निर्देश दिया।

    हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देते हुए H1 बोली लगाने वाला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

    विवादित फ़ैसला सही ठहराते हुए जस्टिस अराधे द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया में सही दखल दिया, क्योंकि अपील करने वाले (H1) के पास NIT की शर्तों के अनुसार ज़रूरी योग्यता नहीं है।

    कोर्ट के अनुसार, अपील करने वाले का पशु मेले आयोजित करने का अनुभव, मंडी परिसर में आने वाले बड़ी संख्या में वाहनों से यूज़र चार्ज वसूलने वाले टेंडर के लिए LoA देने की ज़रूरत के बराबर नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    “H1 बिडर का अनुभव, जैसा कि उसने खुद बताया है, एक मेले के कॉन्ट्रैक्टर/पट्टेदार के तौर पर पशु मेले आयोजित करने का है; न कि सरकार, सेमी-गवर्नमेंट या PSU संस्था के लिए कॉन्ट्रैक्ट के तहत यूज़र चार्ज या पार्किंग फ़ीस वसूलने का। ये दोनों काम एक जैसे नहीं हैं, और कमेटी का 09.03.2026 का पत्र, जिसमें बिना किसी और विचार के इन्हें एक जैसा माना गया, यह दिखाता है कि उसने अपनी ही शर्त की भाषा पर कोई ध्यान नहीं दिया।”

    कोर्ट ने फिर से कहा कि हालांकि टेंडर देने वाली अथॉरिटी आमतौर पर अपनी ज़रूरतों को सबसे बेहतर समझती है और जहां दो सही मतलब निकल सकते हों, वहां कोर्ट को संयम बरतना चाहिए, लेकिन न्यायिक समीक्षा (जुडिशियल रिव्यू) की शक्ति का इस्तेमाल तब किया जा सकता है, जब फ़ैसला “NIT की शर्तों के दायरे से बाहर हो या साफ़ तौर पर मनमाना हो।”

    इसके समर्थन में कोर्ट ने किम्बरली क्लब (P) लिमिटेड बनाम कृषि उत्पादन मंडी परिषद और अन्य 2025 LiveLaw (SC) 1054 का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया:

    “टेंडर के मामलों में न्यायिक समीक्षा करने वाला कोर्ट बिड को अयोग्य ठहराने के टेंडर देने वाली अथॉरिटी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की तरह सुनवाई नहीं करता है। केवल उन मामलों में जहां ऐसा फ़ैसला NIT की शर्तों के दायरे से बाहर हो या साफ़ तौर पर मनमाना हो, कोर्ट न्यायिक समीक्षा की शक्तियों का इस्तेमाल करेगा और ऐसे फ़ैसले को रद्द कर देगा।”

    किम्बरली क्लब मामले में तय किए गए कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

    “कोई भी समझदार अथॉरिटी, अपनी ही तय की गई भाषा पर विचार करते हुए इस नतीजे पर नहीं पहुंच सकती कि H1 बिडर के पास ज़रूरी अनुभव है। इसलिए यह मतलब साफ़ तौर पर मनमाना है और DNIT की शर्तों के दायरे से बाहर है और पूरी तरह से किम्बरली क्लब (P) लिमिटेड (ऊपर ज़िक्र किया गया) और जगदीश मंडल (ऊपर ज़िक्र किया गया) में माने गए सीमित अपवाद के दायरे में आता है। इसलिए हाईकोर्ट का न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल करना और कमेटी के मतलब को वह आम सम्मान न देना सही है, जो टेंडर डॉक्यूमेंट बनाने वाली संस्था को मिलता है।”

    रेवेन्यू (राजस्व) से जुड़ी बातें अयोग्यता को ठीक नहीं कर सकतीं

    कोर्ट ने अपील करने वाले की इस दलील को भी खारिज किया कि सबसे ज़्यादा बोली (बिड) होने के बावजूद उसकी बोली खारिज करने से रेवेन्यू का नुकसान हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि बोलियों की तुलना सिर्फ़ उन्हीं बोली लगाने वालों के बीच की जा सकती है, जो शुरू से ही योग्य हों। वरना, योग्यता की शर्तें सबसे ज़्यादा पैसे की पेशकश के आगे बेअसर हो जाएंगी और उनका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह दलील कि H1 बोली लगाने वाले की बोली लगभग 1.5 करोड़ रुपये ज़्यादा होने के कारण सरकारी खजाने के हित में उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए, H1 बोली लगाने वाले के काम नहीं आती। रेवेन्यू से जुड़ी बातें अयोग्यता को ठीक नहीं कर सकतीं। बोलियों की तुलना सिर्फ़ उन्हीं बोली लगाने वालों के बीच की जा सकती है, जो तुलना के लिए योग्य हों; ऐसा न मानने का मतलब होगा कि योग्यता की हर शर्त को सबसे ज़्यादा बोली गई रकम के आगे झुकने दिया जाए। इससे टेंडर डॉक्यूमेंट, और सरकारी रेवेन्यू इकट्ठा करने में काबिलियत और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए एनलिस्टमेंट निर्देश पूरी तरह बेमानी हो जाएंगे।"

    नतीजतन, अपील खारिज की गई।

    Cause Title: MICKY TRADERS Versus L.R.Y. LABOUR CONTRACTOR & ORS. (with connected appeal)

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story