'वर्दी वाली सेवाओं में नियुक्तियों के लिए ज़्यादा सावधानी ज़रूरी': सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रूप से अनफिट यूपी कांस्टेबल की बर्खास्तगी बहाल की

Shahadat

21 April 2026 11:54 AM IST

  • वर्दी वाली सेवाओं में नियुक्तियों के लिए ज़्यादा सावधानी ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रूप से अनफिट यूपी कांस्टेबल की बर्खास्तगी बहाल की

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल) को कहा कि कोई भी उम्मीदवार, जो पुलिस जैसी सार्वजनिक नौकरी के लिए मेडिकल रूप से अनफिट है, सिर्फ़ प्रशासनिक गलतियों या अपने जैसे दूसरे लोगों के साथ बराबरी के आधार पर अपनी नियुक्ति बरकरार नहीं रख सकता। कोर्ट ने दोहराया कि योग्यता के मापदंड ही सार्वजनिक रोज़गार की बुनियाद होते हैं।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की नियुक्ति को सही ठहराया गया, जबकि भर्ती के समय वह मेडिकल रूप से अनफिट था—एक ऐसी बात जिसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने नज़रअंदाज़ किया।

    मामले की पृष्ठभूमि

    प्रतिवादी को 2005 में पुलिस कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया। हालाँकि, भर्ती में हुई अनियमितताओं की बड़े पैमाने पर समीक्षा के बाद, 2007 में एक मेडिकल बोर्ड ने उसे "नॉक नी" (घुटनों का आपस में टकराना) की समस्या के कारण अनफिट घोषित कर दिया—जो इस पद के लिए एक तय अयोग्यता है। उसी साल उसकी सेवाएँ समाप्त कर दी गईं।

    इसके बाद भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े चल रहे मुकदमों के बीच प्रतिवादी ने 2013 में अस्थायी रूप से अपनी बहाली करवा ली। उसने यह दावा किया कि उसे भी उसी तरह बहाल किया जाए, जैसे एक दूसरे उम्मीदवार को मेडिकल रूप से अनफिट (कलर ब्लाइंडनेस/रंगों को न पहचान पाना) होने के बावजूद बहाल किया गया।

    बाद में राज्य सरकार ने उसके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की, जिसके परिणामस्वरूप 2017 में उसे नौकरी से निकाल दिया गया। इस फ़ैसले को विभागीय अधिकारियों ने भी सही ठहराया। हालांकि, 2021 में राज्य लोक सेवा अधिकरण (Services Tribunal) ने उसकी बर्खास्तगी का फ़ैसला रद्द किया और 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी अधिकरण के इस फ़ैसले को सही ठहराया।

    इन विवादित फ़ैसलों को रद्द करते हुए जस्टिस अमनुल्लाह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि पुलिस जैसी वर्दी वाली सेवाओं में नियुक्ति के लिए मेडिकल फ़िटनेस एक बुनियादी शर्त है। इसलिए न तो प्रतिवादी इस सार्वजनिक पद पर अपना कोई अधिकार जता सकता है, और न ही वह अपने जैसे दूसरे उम्मीदवारों के साथ बराबरी का दावा कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि क़ानून के तहत "नकारात्मक समानता" (negative equality) की कोई अवधारणा नहीं है।

    Cause Title: STATE OF UTTAR PRADESH AND ORS. VERSUS. AJAY KUMAR MALIK

    Next Story