यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने NCLT में कर्मचारियों की नियुक्ति पर कब्ज़ा कर लिया: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
29 Oct 2026 3:30 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस बात पर चिंता जताई कि कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में कर्मचारियों की नियुक्ति पर अपना नियंत्रण कर लिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि मंत्रालय इस संस्थान पर पूरा नियंत्रण पाना चाहता है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने टिप्पणी की,
"मंत्रालय इस संस्थान पर पूरी पकड़ बनाना चाहता है। और यही सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है।"
CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वे NCLT के न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रहे थे।
इस मामले में सीनियर वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने बताया कि पूरी भर्ती प्रक्रिया को एक निजी संस्था को सौंप दिया गया, जिसमें न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति भी शामिल है। उन्होंने आशंका जताई कि जो कर्मचारी लगभग आठ वर्षों से ट्रिब्यूनल में काम कर रहे हैं, उन्हें 1 या 2 नवंबर तक हटाया जा सकता है।
अरोड़ा ने तर्क दिया कि एक न्यायिक संस्थान के कामकाज से जुड़े कर्तव्यों का पालन करने के बावजूद, ये कर्मचारी असल में निजी कर्मचारी बनकर रह जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से न्यायिक कार्यों के स्वतंत्र रूप से होने पर बुरा असर पड़ सकता है।
शुरुआत में CJI ने उन कर्मचारियों की याचिका पर विचार करने को लेकर हिचकिचाहट जताई, जिनका इस मामले में निजी हित है। हालांकि, बेंच ने संकेत दिया कि वे व्यापक संस्थागत हित को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे की जांच करेंगे, खासकर अगर NCLT के अध्यक्ष इस व्यवस्था को लेकर चिंता जताते हैं।
CJI ने कहा,
"हम उन कर्मचारियों की ओर से इस पर विचार नहीं करेंगे, जिनका इसमें निजी हित है। अगर NCLT के अध्यक्ष इस ओर ध्यान दिलाते हैं, तो हम इस पर विचार करेंगे।"
उन्होंने यह भी कहा कि एक रिपोर्ट मिलने के बाद इस मामले को आगे देखा जाएगा।
जस्टिस बागची ने कहा कि भले ही भर्ती प्रक्रिया को आउटसोर्स किया जा सकता है, लेकिन नियोक्ता-कर्मचारी (Employer-Employee) का संबंध ट्रिब्यूनल के पास ही रहना चाहिए।
उन्होंने कहा,
"भर्ती को आउटसोर्स किया जा सकता है, लेकिन नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध बना रहना चाहिए।"
CJI ने सहमति जताई कि इस मुद्दे पर विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति करने की शक्ति NCLT के अध्यक्ष के पास ही होनी चाहिए।
उन्होंने कहा,
"हमें उस हिस्से को लेकर चिंता है। आइए, हम अपनी बात सामने रखें।"
CJI ने आगे कहा कि न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों पर निजी संस्थाओं को नियंत्रण करने की अनुमति देकर ट्रिब्यूनल की स्वायत्तता (Autonomy) से समझौता नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा,
"नियुक्ति की पूरी शक्ति केवल [NCLT] अध्यक्ष के पास ही होनी चाहिए।"
अरोड़ा ने दलील दी कि भले ही कर्मचारियों को शुरुआत में अनुबंध (Contract) के आधार पर रखा गया हो, लेकिन भर्ती नियमों का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सवाल खड़े कर सकती है, जो कानून के समक्ष समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देते हैं।
उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि NCLT अध्यक्ष की मंजूरी के बिना किसी भी कर्मचारी को नौकरी से न निकाला जाए।
हालांकि, CJI ने इस तरह का संरक्षण देने से इनकार किया और कहा कि कोर्ट अध्यक्ष के हाथ नहीं बांध सकता। उन्होंने निर्धारित भर्ती प्रक्रिया का पालन किए बिना अनुबंध कर्मचारियों को नियमित (Regularize) करने के खिलाफ भी चेतावनी दी।
CJI ने टिप्पणी की,
"आप लोग भी 'बैकडोर' (पिछले दरवाजे) से आए हैं। मुझे पता है कि ठेकेदार (Contractors) किस तरह से काम करते हैं। उन्हें न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की कोई परवाह नहीं होती।"
ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता बनाए रखने पर जोर देते हुए CJI ने कहा कि नियुक्तियों के मामले में NCLT अध्यक्ष के पास पूरी स्वायत्तता होनी चाहिए। वे चाहें तो संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) या कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी एजेंसियों के जरिए भर्तियां कर सकते हैं।
आगे कहा गया,
"हम अध्यक्ष के हाथ नहीं बांधेंगे। आप लोग भी 'बैकडोर' से आए हैं। मुझे पता है कि ठेकेदार किस तरह से काम करते हैं। उन्हें न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की कोई परवाह नहीं होती। अध्यक्ष के पास पूरी स्वायत्तता होनी चाहिए। वे UPSC/SSC के जरिए भर्तियां कर सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को MCA (कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय) ने अपने कब्जे में ले लिया है। यही समस्या है। मंत्रालय पूरी तरह से नियंत्रण रखना चाहता है - जो कि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। हम व्यापक हित को देखते हुए नोटिस जारी कर रहे हैं - ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि..."
Case Title : Ziyaul Haq and others v Union of India and others

