एक बार सभी मुद्दों पर ट्रायल शुरू होने के बाद किसी मुद्दे पर शुरुआती सुनवाई नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने CPC के ऑर्डर XIV नियम 2(2) की व्याख्या की
Shahadat
21 Sept 2026 8:22 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार जब सिविल कोर्ट सभी मुद्दों पर एक साथ सुनवाई शुरू कर देता है तो वह 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' (CPC) के ऑर्डर XIV नियम 2(2) के तहत किसी मुद्दे पर शुरुआती सुनवाई का निर्देश नहीं दे सकता।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और केरल हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द किया। ट्रायल कोर्ट ने शुरुआती मुद्दे पर केस को 'टाइम-बार्ड' (समय सीमा खत्म होने के कारण अमान्य) मानकर खारिज कर दिया था, जबकि वादी (Plaintiff) अपने सबूत पेश कर चुका है और प्रतिवादी (Defendants) अपने सबूत पेश करना शुरू कर चुके हैं। बेंच ने केस को बहाल किया और निर्देश दिया कि सुनवाई वहीं से फिर से शुरू हो, जहां वह रुकी हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
वादी ने 2013 में एक सेल डीड (बिक्री विलेख) को अमान्य घोषित करने, मालिकाना हक की घोषणा और 'मेस्ने प्रॉफिट्स' (अवैध कब्जे के दौरान हुई कमाई) के साथ कब्ज़ा वापस पाने की मांग की। वादी का कहना है कि उसने 2005 में केस से जुड़ी ज़मीन के प्रबंधन के लिए एक प्रतिवादी (प्रतिवादी नंबर 1/D1) के पक्ष में 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (GPA) बनाई।
GPA ने D1 को बिक्री की शर्तें तय करने या संपत्ति पर कोई 'चार्ज' (बोझ/ऋण) बनाने का अधिकार नहीं दिया। बाद में वादी ने 2009 में GPA रद्द कर दी। D1 ने जवाब दिया कि ज़मीन पहले ही किसी अन्य व्यक्ति (प्रतिवादी नंबर 2/D2/याचिकाकर्ता) को बेची जा चुकी थी।
ट्रायल कोर्ट के सामने दोनों प्रतिवादियों ने किसी भी धोखाधड़ी से इनकार किया और दलील दी कि केस 'लिमिटेशन' (समय सीमा) के कारण नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने 2015 में मुद्दे तय किए, जिनमें लिमिटेशन के सवाल को 'मुद्दा नंबर 5' के रूप में तय किया गया। इसके बाद केस की सुनवाई शुरू हुई। बाद में 2018 में, D2 (याचिकाकर्ता) ने लिमिटेशन के मुद्दे पर शुरुआती सुनवाई की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने आवेदन स्वीकार कर लिया और 'लिमिटेशन एक्ट, 1963' के आर्टिकल 59 के तहत तीन साल की अवधि (2009 से गिनती करते हुए) लागू करके केस खारिज किया।
पहली अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया, लेकिन इसे 'ऑर्डर VII नियम 11(d) CPC' के तहत 'प्लेन्ट' (वाद-पत्र) को खारिज करने के आदेश में बदल दिया, क्योंकि कोई डिक्री तैयार नहीं की गई। इसके बाद वादी ने केरल हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की। कोर्ट ने कहा कि 'लिमिटेशन' (समय-सीमा) का मामला तथ्य और कानून दोनों से जुड़ा है, इसलिए इसे शुरुआती मुद्दे के तौर पर तय नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि चूंकि वादी का दावा था कि सेल डीड (बिक्री विलेख) अमान्य है, इसलिए आर्टिकल 65 लागू होगा (जो कब्ज़ा वापस पाने के लिए 12 साल की समय-सीमा तय करता है) और मुकदमा समय-सीमा के भीतर था। कोर्ट ने मामले को मेरिट के आधार पर नए सिरे से सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता (D2) ने सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर की।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट वी. चिताम्बरेश ने तर्क दिया कि GPA (जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी) के निष्पादन पर कोई विवाद नहीं है।
राजपाल सिंह बनाम सरोज और राजीव गुप्ता बनाम प्रशांत गर्ग के मामलों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि मांगी गई शुरुआती राहत सेल डीड रद्द करने की, इसलिए आर्टिकल 59 लागू होता है और मुकदमा समय-सीमा से बाहर (barred) माना जाएगा क्योंकि इसे वादी को जानकारी होने के तीन साल बाद दायर किया गया।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों (वादी के कानूनी प्रतिनिधियों) की ओर से सीनियर एडवोकेट वी. गिरी ने तर्क दिया और GPA के तहत अधिकार के दायरे पर सवाल उठाए। यह भी तर्क दिया गया कि शिकायत (plaint) में सेल डीड को ऐसा वैध दस्तावेज़ नहीं माना गया, जिसे रद्द करने की ज़रूरत हो, और वादी इसे नज़रअंदाज़ करके आर्टिकल 65 के तहत कब्ज़े की मांग कर सकता है।
सोपानराव बनाम सैयद महमूद के मामले का हवाला देते हुए यह भी तर्क दिया गया कि घोषणात्मक राहत (Declaratory Relief) मिलने से आर्टिकल 65 अपने आप लागू होना बंद नहीं हो जाता।
Case: John Mathew v Santha Paul & Ors.

