ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के जेंडर सर्टिफिकेट से जुड़े कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, महिलाओं के अधिकारों पर असर का दावा
Praveen Mishra
29 Oct 2026 8:43 PM IST

महिलाओं के अधिकारों से जुड़े संगठन Women's Declaration International India ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आधिकारिक दस्तावेजों में उनकी जन्म के समय निर्धारित जैविक सेक्स से अलग जेंडर दर्ज कराने की अनुमति देने वाले कानूनी प्रावधानों को चुनौती दी है।
याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 को 2026 के संशोधन के संदर्भ में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020 के नियम 7 और उन संबंधित प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं, जिनके तहत आधिकारिक दस्तावेजों में जन्म के समय निर्धारित जैविक सेक्स से अलग जेंडर दर्ज कराया जा सकता है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले National Legal Services Authority v. Union of India (NALSA) पर पुनर्विचार और स्पष्टीकरण की मांग भी की गई है। इस फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान और उसकी कानूनी मान्यता के अधिकार को स्वीकार किया गया था।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि जेंडर पहचान को कानूनी मान्यता देने के दौरान जैविक महिलाओं के लिए विशेष रूप से निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों, आरक्षण तथा अन्य संरक्षणों पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी विचार किया जाना चाहिए।
CJI सूर्यकांत की पीठ के समक्ष मामला
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका को ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम में 2026 के संशोधन को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित सिब्बल ने कहा कि संगठन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का विरोध नहीं कर रहा है। हालांकि, उनका कहना था कि उन कानूनी लाभों और संरक्षणों पर भी विचार किया जाना चाहिए, जो विशेष रूप से जैविक महिलाओं के लिए निर्धारित हैं।
सिब्बल ने दलील दी कि जेंडर पहचान के अधिकार को मान्यता देने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि महिलाओं के लिए विशेष रूप से निर्धारित अधिकार और सुविधाएं प्रभावित हों।
इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, “आप सुरंग के दूसरे छोर से रोशनी दिखा रहे हैं।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मुख्य याचिकाओं में जवाब तैयार किया जा रहा है और मौजूदा याचिका पर भी संबंधित जवाब शामिल किया जाएगा।
जैविक सेक्स और जेंडर पहचान को अलग-अलग मानने की दलील
याचिका में कहा गया है कि जैविक सेक्स और जेंडर पहचान अलग अवधारणाएं हैं। याचिकाकर्ता किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान रखने और व्यक्त करने के अधिकार पर सवाल नहीं उठा रहा, बल्कि यह तर्क दे रहा है कि केवल जेंडर पहचान या सर्जरी के आधार पर जैविक सेक्स से जुड़े सभी कानूनी अधिकार और लाभ स्वतः प्राप्त नहीं होने चाहिए।
याचिका के अनुसार, चिकित्सा या सर्जिकल प्रक्रियाओं से शारीरिक अंगों और द्वितीयक लैंगिक विशेषताओं में बदलाव हो सकता है, लेकिन इससे व्यक्ति के क्रोमोसोम या आनुवंशिक संरचना नहीं बदलती। याचिकाकर्ता का दावा है कि जैविक सेक्स के स्थान पर जेंडर पहचान को निर्णायक मानने से महिलाओं के लिए बनाए गए कानूनी संरक्षणों के दायरे और लागू होने को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने याचिका में उठाए गए तर्क का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि जन्म के समय पुरुष निर्धारित किए गए, लेकिन स्वयं को महिला के रूप में पहचानने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्ति को जैविक महिला के समान कानूनी दर्जा देने का सवाल विचारणीय है।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस विषय पर विधायिका निर्णय ले सकती है। जस्टिस बागची ने इस पर कहा कि याचिकाकर्ता की दलील है कि विधायिका ने इस विशेष प्रश्न का समाधान नहीं किया है।
सुनवाई में प्रजनन क्षमता, महिलाओं की खेल प्रतियोगिताओं में भागीदारी, महिला जेलों में रखे जाने और व्यक्तिगत तलाशी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। ये मुद्दे याचिकाकर्ता की दलीलों और सुनवाई के दौरान उठाए गए उदाहरणों का हिस्सा थे।
महिला आरक्षण, खेल और अलग सुविधाओं से जुड़े फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलों के समर्थन में विभिन्न हाईकोर्ट के फैसलों और प्रशासनिक निर्णयों का उल्लेख किया है।
Anjali Guru Sanjana Jaan v. State of Maharashtra: याचिका में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें महिला के रूप में पहचान रखने वाले जन्म के समय पुरुष निर्धारित व्यक्ति को महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायत सीट से चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई थी।
केरल राज्य निर्वाचन आयोग का निर्णय: नवंबर 2025 में दो ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों, अमाया प्रसाद और अरुणिमा एम. कुरुप, को महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानीय निकाय सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति देने वाले निर्णय का भी उल्लेख किया गया।
Hina Haneefa v. State of Kerala: केरल हाईकोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर महिला को राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) की गर्ल्स डिवीजन में शामिल होने की अनुमति दी थी।
S. Mani v. The Additional Chief Secretary to Government: याचिका में मद्रास हाईकोर्ट के उस मामले का उल्लेख है, जिसमें जन्म के समय पुरुष निर्धारित व्यक्ति, जिसके दस्तावेजों में महिला के रूप में पहचान दर्ज थी, को सरकारी अस्पताल में महिला नर्सिंग असिस्टेंट के रिक्त पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।
Anamika v. State of Kerala: केरल हाईकोर्ट ने अलग ट्रांसजेंडर श्रेणी के अभाव में जन्म के समय पुरुष निर्धारित, लेकिन महिला के रूप में पहचान रखने वाले व्यक्ति को जिला स्तरीय जूडो प्रतियोगिता में महिला वर्ग में भाग लेने की अनुमति दी थी।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन फैसलों से महिला आरक्षण, लिंग-विशिष्ट पदों पर भर्ती, खेल प्रतियोगिताओं और महिलाओं के लिए निर्धारित अलग सुविधाओं पर प्रभाव से जुड़े प्रश्न उठते हैं।
संविधान के कई अनुच्छेदों के उल्लंघन का दावा
याचिका में दावा किया गया है कि चुनौती दिए गए प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3), 16, 19(1)(a) और 21 का उल्लंघन करते हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन प्रावधानों के कारण जैविक महिलाओं के लिए विशेष रूप से निर्धारित अधिकार और संरक्षण प्रभावित हो सकते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के NALSA v. Union of India (2014) फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान और उसकी कानूनी मान्यता के अधिकार को स्वीकार किया गया था, लेकिन उस फैसले में यह तय नहीं किया गया था कि विपरीत सेक्स के रूप में पहचान रखने वाले व्यक्ति को उस सेक्स के लिए विशेष रूप से निर्धारित प्रत्येक कानूनी लाभ या संरक्षण भी स्वतः मिलना चाहिए।

