निजी WhatsApp ग्रुप में आलोचना मात्र से IPC की धाराएं नहीं लगेंगी, आवश्यक तत्व साबित होना जरूरी: तेलंगाना हाईकोर्ट
Praveen Mishra
12 Jun 2026 11:00 PM IST

तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा है कि किसी निजी WhatsApp ग्रुप में किसी जनप्रतिनिधि की आलोचना मात्र से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 504, 505(1)(b) और 506 के तहत अपराध नहीं बन जाता, जब तक कि इन धाराओं के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से स्थापित न हों।
जस्टिस के. सुजाना की एकल पीठ ने कहा कि निजी सोशल मीडिया समूह में व्यक्त की गई आलोचना, अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती। अभियोजन पक्ष को संबंधित धाराओं के तहत आवश्यक कानूनी तत्वों को साबित करना होगा।
मामला “Save Democracy” नामक WhatsApp ग्रुप में पोस्ट किए गए संदेशों से जुड़ा था। आरोप था कि आरोपी ने एक जनप्रतिनिधि के खिलाफ अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणियां की थीं। संदेशों में संबंधित मंत्री को “गुंडा” बताया गया था और उनके करोड़ों रुपये की संपत्ति अर्जित करने को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणियां की गई थीं।
आरोपी ने दलील दी कि ये संदेश राजनीतिक आलोचना की श्रेणी में आते हैं और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संरक्षित हैं। साथ ही इनमें न तो किसी को धमकी दी गई और न ही सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए उकसाने का कोई इरादा था।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया कि संदेश मुख्य रूप से एक जनप्रतिनिधि की आलोचना थे। अदालत ने कहा कि धारा 504 के लिए जानबूझकर ऐसा अपमान होना चाहिए जिससे शांति भंग होने की संभावना हो, जबकि धारा 505(1)(b) के लिए जनता में भय या अशांति फैलाने का इरादा आवश्यक है। इसी प्रकार धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी साबित करने के लिए वास्तविक धमकी और उससे उत्पन्न भय का होना जरूरी है।
अदालत ने पाया कि मामले में इन धाराओं के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि संदेशों को मानहानिकारक माना जाए, तो यह अधिकतम मानहानि का मामला हो सकता है, जिसके लिए प्रभावित व्यक्ति को कानून के अनुसार अलग से कार्रवाई करनी होगी।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसलिए अदालत ने आरोपी की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने वाले निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।

