वकीलों को अनुशासन में रहना जरूरी, पेशे की बदनामी नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल का सस्पेंशन सही बताया

  • वकीलों को अनुशासन में रहना जरूरी, पेशे की बदनामी नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल का सस्पेंशन सही बताया

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (26 मई) को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को चुनौती देने वाले एक वकील द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसने उसे सात साल के लिए लीगल प्रैक्टिस से निलंबित कर दिया था।

    सजा तब लगाई गई जब वकील ने शिकायतकर्ता के स्वामित्व वाले मदुरै में एक होटल में अपनी कार चलाई।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ ने अपील खारिज कर दी।

    जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की, "अपना आचरण देखें। एक वकील के रूप में आपने शिकायतकर्ता के होटल में अपनी कार को टक्कर मार दी। वकीलों को अनुशासित होने की जरूरत है और पूरे पेशे की छवि खराब नहीं करनी चाहिए।

    शुरुआत में बीसीआई ने वकील को एक साल के लिए निलंबित कर दिया था। शिकायतकर्ता ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

    इसके बाद शिकायतकर्ता ने बीसीआई के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर की। समीक्षा के बाद बीसीआई ने निलंबन की अवधि बढ़ाकर सात साल कर दी। इसके बाद वकील ने संशोधित सजा को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता-वकील के वकील अभिनव अग्रवाल ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिकायतकर्ता की पहले की अपील को मेरिट के आधार पर खारिज करने के बाद बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति पुनर्विचार पर विचार नहीं कर सकती थी। हालांकि, खंडपीठ इससे असहमत थी।

    अग्रवाल ने शिकायतकर्ता की अपील में सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि बीसीआई के आदेश और सजा (एक साल) में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं था और अपील खारिज कर दी थी।

    हालांकि, आज खंडपीठ ने कहा कि वकील का आचरण, उस अवधि के दौरान वकालतनामा दाखिल करके प्रारंभिक एक साल के निलंबन का उल्लंघन भी शामिल है। अंततः न्यायालय ने अपील खारिज कर दी।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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