यतिन ओझा को सुप्रीम कोर्ट की 'अंतिम माफी', अवमानना दोषसिद्धि और सजा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

Praveen Mishra

11 May 2026 4:44 PM IST

  • यतिन ओझा को सुप्रीम कोर्ट की अंतिम माफी, अवमानना दोषसिद्धि और सजा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

    सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट यतिन ओझा को बड़ी राहत देते हुए गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 2020 के आपराधिक अवमानना मामले में दी गई दोषसिद्धि और सजा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (In Abeyance) कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में यदि उन्होंने इसी तरह का कोई आचरण दोहराया, तो गुजरात हाईकोर्ट की सजा और दोषसिद्धि फिर से प्रभावी की जा सकती है।

    जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला कोविड-19 अवधि के दौरान गुजरात हाईकोर्ट प्रशासन के खिलाफ यतिन ओझा द्वारा की गई सार्वजनिक टिप्पणियों से जुड़ा था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट के आदेश में दिए गए कारणों में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद, “अंतिम क्षमादान” (Final Act of Forgiveness) देते हुए कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर ओझा की दोषसिद्धि और सजा को अनिश्चितकाल तक स्थगित रखने का फैसला किया।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक दोषसिद्धि और सजा स्थगित रहेगी, तब तक यतिन ओझा को किसी भी प्रकार की अयोग्यता या नुकसान का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसमें Advocates Act की धारा 16(4A) के तहत वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी अयोग्यता भी शामिल है।

    सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट की फुल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह हर दो साल में यतिन ओझा के आचरण की समीक्षा करे। यदि भविष्य में वे इसी प्रकार का कोई कृत्य करते पाए गए, तो हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट में आवेदन देकर उनकी दोषसिद्धि और सजा को फिर से लागू कराने की मांग कर सकता है।

    कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से यह भी कहा कि वह 2024 की एक अन्य घटना और यतिन ओझा के सीनियर एडवोकेट पदनाम को वापस लेने के मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से नया निर्णय ले, और इस अवमानना मामले की दोषसिद्धि से प्रभावित न हो।

    सुप्रीम कोर्ट ने बार और बेंच के रिश्ते पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि दोनों न्याय व्यवस्था के “रथ के दो पहिए” हैं और न्याय सुनिश्चित करने के लिए दोनों का संतुलन और पारस्परिक सम्मान जरूरी है।

    कोर्ट ने कहा कि बार मुकदमादाताओं की निर्भीक आवाज होती है, जबकि बेंच संविधान और कानून की अंतिम संरक्षक होती है। दोनों संस्थाओं का सम्मान एक-दूसरे से जुड़ा है और किसी एक की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला आचरण पूरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है।

    पीठ ने यह भी कहा कि जवाबदेही जरूरी है, लेकिन न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल संयम और सुधारात्मक दृष्टिकोण के साथ होना चाहिए, न कि केवल दंडात्मक तरीके से।

    मामला 2020 में शुरू हुआ था, जब यतिन ओझा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोविड काल के दौरान गुजरात हाईकोर्ट के कामकाज को लेकर टिप्पणियां की थीं। इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने उन्हें आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुए ₹2,000 जुर्माना और अदालत उठने तक की सजा सुनाई थी।

    गुजरात हाईकोर्ट ने जुलाई 2020 में उनका सीनियर एडवोकेट पदनाम भी वापस ले लिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में अस्थायी रूप से उनका पदनाम बहाल किया था, जिसे इस वर्ष आगे बढ़ा दिया गया।

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