कोलकाता ऑरेंज लाइन मेट्रो परियोजना में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की पश्चिम बंगाल सरकार को फटकार, याचिका खारिज
Praveen Mishra
23 March 2026 5:16 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कोलकाता की ऑरेंज लाइन मेट्रो परियोजना (न्यू गरिया से सॉल्ट लेक सेक्टर-V) के कार्यान्वयन में देरी को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये को “हठधर्मी (obstinate attitude)” बताते हुए कहा कि यह एक सार्वजनिक अवसंरचना परियोजना को अनावश्यक रूप से रोकने का प्रयास है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टीस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कोलकाता हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे चिंगरीघाटा जंक्शन पर मेट्रो पिलर निर्माण के लिए लगातार दो वीकेंड नाइट ट्रैफिक ब्लॉकेज की तारीखें तय करें।
“त्योहार विकास से ज्यादा महत्वपूर्ण?”
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने राज्य सरकार के उस तर्क पर नाराजगी जताई, जिसमें कहा गया था कि त्योहारों के कारण पुलिस सहयोग उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। उन्होंने टिप्पणी की,
“आपने हाईकोर्ट से कहा कि त्योहार हैं, इसलिए हम पुलिस नहीं दे सकते। क्या आपके लिए त्योहार विकास से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?”
चीफ़ जस्टिस ने भी कहा,
“हर चीज को राजनीतिक मत बनाइए, यह विकास का मुद्दा है।”
“संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन”
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के आचरण को गंभीर बताते हुए कहा कि यह उनके संवैधानिक कर्तव्यों की अनदेखी दर्शाता है। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यह ऐसा मामला था, जिसमें मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती थी।
राज्य का पक्ष खारिज
राज्य सरकार ने दलील दी थी कि प्रभावित मार्ग पर एंबुलेंस और अंग प्रत्यारोपण वाहन चलते हैं, इसलिए सुरक्षा कारणों से समय चाहिए। हालांकि, कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ।
हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और राज्य सरकार का रवैया परियोजना को जानबूझकर विलंबित करने का संकेत देता है। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि अब यह परियोजना तय समयसीमा में पूरी होगी।
राज्य सरकार के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, लेकिन कोर्ट ने इसे अस्वीकार कर दिया।
पृष्ठभूमि
यह विवाद कोलकाता हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें कहा गया था कि ट्रैफिक डायवर्जन की अनुमति में देरी से सार्वजनिक हित प्रभावित हो रहा है और परियोजनाओं की लागत बढ़ रही है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत जैसे देश में, जहां पूरे साल त्योहार होते हैं, उन्हें आधार बनाकर विकास परियोजनाओं में देरी नहीं की जा सकती।

