रात 1 बजे वाहन उठाना 'गुंडागर्दी': लोन रिकवरी के लिए फाइनेंसर बल प्रयोग नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट ने ₹10 लाख मुआवजा दिया

  • रात 1 बजे वाहन उठाना गुंडागर्दी: लोन रिकवरी के लिए फाइनेंसर बल प्रयोग नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट ने ₹10 लाख मुआवजा दिया

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाइपोथिकेटेड वाहन की जब्ती का फाइनेंसर का अधिकार बल, धोखे या लोन एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन करके इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। लोन की रिकवरी या वाहन की जब्ती केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने वाहन मालिक को ₹10 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसका ट्रक कथित तौर पर रात करीब 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर बिना किसी पूर्व नोटिस के उठा लिया गया था।

    मामला एक ट्रक मालिक से जुड़ा था, जिसने 2019 में Cholamandalam Investment and Finance Company Ltd. से कमर्शियल व्हीकल लोन लिया था। वाहन को लोन के लिए हाइपोथिकेट किया गया था। बाद में जून 2021 में अतिरिक्त लोन भी दिया गया। किस्तों में डिफॉल्ट के बाद कंपनी ने 2022 में वाहन अपने कब्जे में लिया था, लेकिन आंशिक भुगतान के बाद उसे वापस कर दिया।

    अप्रैल 2023 में ट्रक CCTV निगरानी वाले स्थान पर खड़ा था। आरोप है कि चार अज्ञात लोगों ने रात करीब 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़ा और वाहन लेकर चले गए। वाहन मालिक ने उसी दिन ई-एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। बाद में उसे लीगल नोटिस के जरिए पता चला कि कंपनी ने वाहन को अपने कब्जे में लेकर बेच दिया है और बिक्री के बाद भी उससे रकम बकाया बताई जा रही है।

    'रिकवरी एजेंट किसी भी जगह जाकर वाहन नहीं उठा सकते'

    सुप्रीम कोर्ट ने RBI की ओर से जारी Fair Practices Code और Debt Collection Guidelines का हवाला देते हुए कहा कि कर्ज की वसूली के लिए उधारकर्ताओं को परेशान करना, देर रात संपर्क करना या बल प्रयोग करना स्वीकार्य नहीं है।

    पीठ ने अपने पुराने फैसले ICICI Bank Ltd. v. Prakash Kaur (2007) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि देश में कानून का शासन है और बैंक या वित्तीय संस्थान वाहनों की जब्ती के लिए गुंडों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

    कोर्ट ने कहा कि वाहन की जब्ती का प्रावधान वैध होना चाहिए और Indian Contract Act, 1872 तथा RBI के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होना चाहिए। ऐसे प्रावधान में वाहन कब्जे में लेने से पहले नोटिस की अवधि, कब्जा लेने की प्रक्रिया और वाहन बेचने से पहले कर्जदार को भुगतान का अंतिम अवसर दिया जाना चाहिए।

    लोन एग्रीमेंट की शर्त को भी कोर्ट ने खारिज किया

    लोन एग्रीमेंट के Article 11 में कहा गया था कि डिफॉल्ट होते ही उधारकर्ता के वाहन पर अधिकार बिना किसी नोटिस के स्वतः समाप्त हो जाएगा। हालांकि, एग्रीमेंट में कब्जा लेने से पहले सात दिन का नोटिस देने का प्रावधान भी था।

    कोर्ट ने कहा कि यह शर्त वैध repossession clause के लिए जरूरी सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करती। कंपनी को नोटिस की आवश्यकता को अपनी इच्छा से खत्म करने का अधिकार देना भी उचित नहीं है।

    पीठ ने कहा कि बिना सात दिन का नोटिस दिए वाहन कब्जे में लेने का अधिकार कंपनी को मिला ही नहीं था। रात 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले जाना किसी भी तरह शांतिपूर्ण कब्जा नहीं माना जा सकता और यह वही तरीका है जिसकी कोर्ट ने Prakash Kaur मामले में निंदा की थी।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि कब्जे के मेमो पर वाहन मालिक के हस्ताक्षर तक नहीं थे।

    'वाहन ही उसकी आजीविका का साधन था'

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता सीमित साधनों वाला व्यक्ति था और अपनी आजीविका के लिए इसी वाहन पर निर्भर था। कानून और अनुबंध की प्रक्रिया का पालन किए बिना वाहन छीनने से उसके जीविका के अधिकार पर असर पड़ा।

    कोर्ट ने कहा कि जब फाइनेंसर कानून के दायरे से बाहर जाकर आधी रात में बिना नोटिस और उचित प्रक्रिया के वाहन कब्जे में लेता है, तो वह कानूनी सुरक्षा खो देता है और अनधिकृत एवं मनमाने तरीके से वाहन जब्त करने के परिणामों के लिए उत्तरदायी होता है।

    कंपनी को ₹14.5 लाख से अधिक का भुगतान करना होगा

    सुप्रीम कोर्ट ने वाहन की बिक्री को रद्द करने से इनकार किया, लेकिन कंपनी को दोनों लोन अकाउंट बंद करने और वाहन की ₹4.50 लाख बिक्री राशि 6% वार्षिक ब्याज सहित वापस करने का निर्देश दिया।

    इसके अलावा वाहन मालिक को मानसिक पीड़ा और लंबे समय तक आजीविका के नुकसान के लिए ₹10 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया गया।

    अपीलकर्ता को मुकदमे की लागत के रूप में ₹50,000 भी दिए गए।

    कोर्ट ने RBI को भी निर्देश दिया कि वह NBFCs और Scheduled Commercial Banks द्वारा अपने दिशा-निर्देशों और Master Circulars के वास्तविक अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए, ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति को बिना नोटिस और कानूनी उपाय के आधी रात में उसकी आजीविका से वंचित न किया जाए।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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