अलकनंदा-भागीरथी बेसिन में नए जलविद्युत प्रोजेक्ट्स के खिलाफ केंद्र, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा
Praveen Mishra
21 May 2026 4:01 PM IST

उत्तराखंड में वर्ष 2013 की भीषण बाढ़ त्रासदी से जुड़े मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण हलफनामा दाखिल कर कहा है कि गंगा नदी के ऊपरी बेसिन क्षेत्र में अब कोई नया जलविद्युत परियोजना (Hydro Electric Project) शुरू नहीं किया जाना चाहिए। केंद्र ने केवल सात मौजूदा या प्रगति पर चल रही परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति देने का समर्थन किया है।
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन के ऊपरी क्षेत्रों की पारिस्थितिकी अत्यंत संवेदनशील और आपदा-प्रवण है। ऐसे में नए हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की अनुमति देना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं होगा।
हलफनामे में जिन सात परियोजनाओं को अनुमति देने की बात कही गई है, उनमें टिहरी स्टेज-II, तपोवन विष्णुगढ़, विष्णुगढ़ पिपलकोटी, सिंगोली भटवारी, फाटा ब्युंग, मध्यमहेश्वर और कैलगंगा-II परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें से चार परियोजनाएं पहले ही चालू हो चुकी हैं, जबकि तीन परियोजनाएं काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं।
केंद्र ने स्पष्ट रूप से कहा कि इन सात परियोजनाओं के अलावा अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन में किसी अन्य नए जलविद्युत परियोजना को अनुमति देने के पक्ष में वह नहीं है।
दरअसल, यह मामला वर्ष 2013 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद शुरू हुआ था, जिसने हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और आपदा जोखिम को उजागर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष जनवरी में केंद्र सरकार को विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर अंतिम निर्णय लेने के लिए तीन महीने का समय दिया था।
इसके बाद पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय के संयुक्त रुख को लेकर यह हलफनामा दाखिल किया गया।
हलफनामे में कहा गया कि पहले विशेषज्ञ निकाय (EB-II) ने 28 परियोजनाओं की सिफारिश की थी, लेकिन उसकी मूल्यांकन प्रक्रिया में भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), भूकंपीय गतिविधियां और अन्य गंभीर जोखिम कारकों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया था।
केंद्र ने अदालत को बताया कि उत्तराखंड का यह क्षेत्र भूकंपीय, हिमनदीय, भू-आकृतिक और जल विज्ञान संबंधी दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट (Sui Generis) है और यहां लगातार प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं। इसलिए यहां जलविद्युत परियोजनाओं के संबंध में सामान्य नीति लागू नहीं की जा सकती।
हालांकि केंद्र ने यह भी स्वीकार किया कि जलविद्युत परियोजनाएं स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन गंगा के ऊपरी बेसिन का पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इतना संवेदनशील है कि यहां परियोजनाओं की व्यवहार्यता का आकलन विशेष सावधानी के साथ किया जाना आवश्यक है।

