सिर्फ 'श्री' नाम समान होने पर श्रीलंकाई नागरिक को ठहराया आरोपी: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की UAPA के तहत दोषसिद्धि
Praveen Mishra
21 May 2026 3:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम [UAPA] के तहत दोषी ठहराए गए एक श्रीलंकाई नागरिक की सजा रद्द कर दी। अदालत ने पाया कि आरोपी की पहचान गलत तरीके से एक फरार मुख्य आरोपी के रूप में कर दी गई थी, केवल इसलिए क्योंकि दोनों के नाम में “श्री” शब्द समान था।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी की पहचान विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करने में विफल रहा।
मामला वर्ष 2015 में दर्ज उस FIR से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ लोग प्रतिबंधित संगठन LTTE को फिर से सक्रिय करने की साजिश रच रहे थे। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने त्रिची में बैठक कर श्रीलंका भेजने के लिए साइनाइड कैप्सूल और रसायन जुटाए थे। मामले में आरोपी नंबर-5 “श्री” पर 75 साइनाइड कैप्सूल और GPS-4 नामक रसायन उपलब्ध कराने का आरोप था।
हालांकि अपीलकर्ता, जिसका वास्तविक नाम “रंजन” था, को दिसंबर 2021 में गिरफ्तार किया गया। उसने लगातार कहा कि वह “श्री” नहीं है और वह 2012 से त्रिची में पंजीकृत श्रीलंकाई शरणार्थी के रूप में खुले तौर पर रह रहा था। वह 2009 में वैध पासपोर्ट और वीजा के साथ भारत आया था तथा स्थानीय पुलिस को उसके पते की जानकारी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का पूरा मामला केवल दो गवाहों (PW-8 और PW-9) के बयानों पर आधारित था। अदालत ने कहा कि इन गवाहों ने पहले की सुनवाई और बयानों में कभी “रंजन” का नाम नहीं लिया था। केवल गिरफ्तारी के बाद पहली बार उन्होंने “श्री उर्फ रंजन” का जिक्र किया, जिससे उनकी गवाही संदिग्ध हो गई।
अदालत ने कहा कि इतने वर्षों बाद अचानक नाम सामने आना “स्मृति की भूल” नहीं बल्कि गवाही में “सुधार” (Improvement) है, जो अभियोजन के मामले को कमजोर करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी की उस विफलता को भी गंभीर माना जिसमें गिरफ्तारी के बाद टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई। अदालत ने कहा कि जब आरोपी की पहचान शुरू से स्पष्ट नहीं थी और FIR या गवाहों के पुराने बयानों में उसका कोई उल्लेख नहीं था, तब TIP कराना बेहद जरूरी था।
खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि “रंजन” ही फरार आरोपी “श्री” था। अदालत ने माना कि विश्वसनीय पहचान संबंधी सामग्री और स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में दोषसिद्धि को बरकरार रखना सुरक्षित नहीं होगा।
इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि रद्द कर दी और त्रिची स्थित स्पेशल कैंप से अपीलकर्ता की तत्काल रिहाई का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने उसे कानून के अनुसार स्विट्जरलैंड स्थानांतरित होने के अनुरोध को आगे बढ़ाने की भी स्वतंत्रता दी।

