शरीयत आवेदन अधिनियम के तहत नियम क्यों नहीं बने? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूपी सरकार से मांगा जवाब
Praveen Mishra
16 Feb 2026 5:57 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 4 के तहत आवश्यक नियम अब तक क्यों नहीं बनाए गए।
जस्टीस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या उत्तर प्रदेश में उक्त अधिनियम की धारा 4 को प्रभावी रूप से लागू किया गया है।
धारा 3 और 4 का महत्व
अदालत ने कहा कि नियमों के अभाव में कोई मुस्लिम व्यक्ति धारा 3 के तहत आवश्यक घोषणा (Declaration) प्रभावी ढंग से दाखिल ही नहीं कर सकता। धारा 3 के अनुसार, कोई मुस्लिम व्यक्ति विवाह, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, अभिभावकता आदि मामलों में शरीयत कानून के अनुसार शासित होने की इच्छा जताते हुए निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष घोषणा कर सकता है। ऐसी घोषणा स्वीकार होने पर उस व्यक्ति और उसके वंशजों पर शरीयत कानून लागू होता है।
धारा 4 राज्य सरकार को यह जिम्मेदारी देती है कि वह ऐसे नियम बनाए जिनमें यह तय हो कि यह घोषणा किस प्राधिकारी के समक्ष और किस प्रक्रिया के तहत की जाएगी।
अदालत ने टिप्पणी की कि जब तक धारा 4 के तहत आवश्यक प्रपत्र, सक्षम प्राधिकारी और प्रक्रिया निर्धारित नहीं होगी, तब तक किसी वसीयत को औपचारिक रूप से शरीयत कानून के अधीन घोषित नहीं किया जा सकता।
मामला क्या है
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील 2011 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देती है, जिसमें मृतका नवाब बेगम की 1992 की वसीयत को अवैध ठहराया गया था। यह अपील उनकी बेटी गोहर सुल्तान ने दायर की है।
हाईकोर्ट ने कहा था कि वसीयत को प्रमाणित करने वाला एकमात्र गवाह शत्रुतापूर्ण (hostile) हो गया, जिससे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत आवश्यक सख्त प्रमाण पूरा नहीं हुआ। साथ ही, मृतका ने शरीयत कानून के तहत शासित होने की औपचारिक घोषणा नहीं की थी, इसलिए वसीयत को सामान्य कानून के अनुसार ही परखा जाएगा, जिसमें दो गवाहों की आवश्यकता होती है।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि मृतका धारा 3 के तहत घोषणा कर ही नहीं सकती थीं, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने धारा 4 के तहत आवश्यक नियम बनाए ही नहीं थे। इस पर अदालत ने कहा:
“हमारे संज्ञान में लाया गया है कि अब तक धारा 4 का अनुपालन नहीं किया गया है।”
इसी कारण अदालत ने भारत सरकार के विधि विभाग के सचिव और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया।
चूंकि मृतका उत्तर प्रदेश की निवासी थीं और वह आवश्यक घोषणा नहीं कर सकीं, इसलिए राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा गया है।
अगली सुनवाई
अदालत ने मामले को 18 फरवरी 2026 को फिर से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है और तब तक नए पक्षकारों को हलफनामा दाखिल कर वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
यह मामला शरीयत कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े प्रक्रियात्मक ढांचे पर महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है।

