सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप तय करने से पहले मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करने का निर्देश रद्द किया

Shahadat

11 Jun 2026 8:10 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप तय करने से पहले मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करने का निर्देश रद्द किया

    सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्देश को रद्द किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (PC Act) के तहत मामलों में आरोप तय करने से पहले CrPC की धारा 311 के तहत मंज़ूरी देने वाले अधिकारियों की जांच करने के लिए कहा गया था। कोर्ट ने कहा कि अदालतें आपराधिक कानून में शामिल न की गई कोई नई प्रक्रियात्मक स्टेज नहीं बना सकतीं।

    जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने कहा कि CrPC आपराधिक मुकदमों के संचालन के लिए एक पूरी प्रक्रिया तय करती है और अदालतें न्यायिक निर्देशों के ज़रिए ट्रायल कोर्ट को उस प्रक्रिया से अलग होने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं।

    कोर्ट ने कहा,

    "न्यायिक आदेश से मुकदमे में कोई नया चरण नहीं जोड़ा जा सकता। आपराधिक मामले में मुकदमे का संचालन - जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध भी शामिल हैं - 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसिजर' (CrPC)/BNSS और PC Act के प्रावधानों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसिजर' को फिर से नहीं लिख सकता और PC Act के तहत सभी सेशन कोर्ट/स्पेशल कोर्ट को आरोप तय करने या मुकदमा शुरू होने से पहले ही मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करने का निर्देश नहीं दे सकता।"

    ये अपीलें हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ थीं, जिसमें आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज की गई। हालांकि बाद में आरोपी बरी हो गया और मंज़ूरी को चुनौती देने का मामला बेअसर हो गया। फिर भी मध्य प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले में जारी व्यापक निर्देशों को चुनौती दी।

    हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने वाले ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह CrPC की धारा 311 का इस्तेमाल करके संज्ञान लेने के चरण में ही मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करें। इसका तर्क यह था कि मंज़ूरी आदेश की वैधता की जांच शुरुआती चरण में ही की जानी चाहिए ताकि लंबी सुनवाई से पहले ही खराब मंज़ूरी की पहचान की जा सके।

    समीक्षा कार्यवाही में हाईकोर्ट ने गाइडलाइन बरकरार रखी और कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' की धारा 19(4) मंज़ूरी से संबंधित आपत्तियों को शुरुआती चरण में उठाने की अनुमति देती है। इसने दोहराया कि मुकदमे से पहले मंज़ूरी देने वाले अधिकारी की जांच करने से ऐसी स्थितियों से बचा जा सकेगा, जहां बाद में केवल अमान्य मंज़ूरी के कारण दोषसिद्धि रद्द की जाती है।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य ने तर्क दिया कि इन निर्देशों से भ्रष्टाचार के मामलों के अलावा अन्य आपराधिक मुकदमों में भी मुश्किलें पैदा होंगी। यह तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 311 की गलत व्याख्या की थी, जिसमें माना गया कि कोर्ट चार्जशीट दाखिल होने के तुरंत बाद और ट्रायल शुरू होने से पहले गवाहों को बुलाकर उनसे पूछताछ कर सकते हैं।

    हालांकि, प्रतिवादी ने इन निर्देशों का बचाव करते हुए तर्क दिया कि CrPC की धारा 311 कोर्ट को जांच, ट्रायल या अन्य कार्यवाही के किसी भी चरण में किसी भी व्यक्ति को बुलाने और उससे पूछताछ करने का अधिकार देती है और हाईकोर्ट के निर्देश इस प्रावधान की भाषा के अनुरूप थे।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CrPC में आपराधिक ट्रायल को नियंत्रित करने वाला पूरा ढांचा मौजूद है। कोर्ट ने गौर किया कि आपराधिक कार्यवाही के चरण कोड के अध्याय 15 से 21 में बताए गए और धारा 311 अध्याय 24 के अंतर्गत आती है, जिसमें जांच और ट्रायल से संबंधित सामान्य प्रावधान हैं।

    कोर्ट ने कहा कि इस सामान्य प्रावधान की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती कि आपराधिक कोर्ट को ट्रायल चलाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार करना पड़े और एक नई कार्यप्रणाली विकसित करनी पड़े, जिसमें आरोप तय होने से पहले मंजूरी देने वाले अधिकारियों से पूछताछ की आवश्यकता हो।

    कोर्ट ने जोर देकर कहा,

    "इस सामान्य प्रावधान को ट्रायल चलाने के एक चरण के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता, जिससे अधिकार क्षेत्र वाली आपराधिक कोर्ट को ट्रायल चलाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार करने और आरोप तय करने से पहले मंजूरी देने वाले अधिकारी से पूछताछ करके ट्रायल चलाने के लिए नई प्रक्रिया या कार्यप्रणाली विकसित करने के लिए मजबूर होना पड़े। CrPC में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं दी गई, जिससे ऐसा कदम उठाया जा सके।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि आपराधिक ट्रायल, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमे भी शामिल हैं, सख्ती से CrPC या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अनुसार और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के साथ मिलाकर चलाए जाने चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए आपराधिक ट्रायल को नियंत्रित करने वाले प्रक्रियात्मक कानून को फिर से नहीं लिख सकता है और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सभी सेशन कोर्ट्स और स्पेशल कोर्ट्स को आरोप तय करने या ट्रायल शुरू होने से पहले मंजूरी देने वाले अधिकारियों से पूछताछ करने का निर्देश नहीं दे सकता है।

    इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 32 और 33 रद्द किया।

    Case Title – State of Madhya Pradesh v. Ravi Shankar Singh

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