खुद की मेडिकल जांच का विरोध सरकारी काम में बाधा नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द की

Amir Ahmad

26 Aug 2026 1:31 PM IST

  • खुद की मेडिकल जांच का विरोध सरकारी काम में बाधा नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द की

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मेडिकल जांच का विरोध करना भारतीय दंड संहिता की धारा 186 के तहत सरकारी कर्मचारी को उसके सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन में बाधा पहुंचाने का अपराध नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब व्यक्ति बाद में मेडिकल जांच के लिए तैयार हो गया हो।

    जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्लि की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें पुलिस द्वारा दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार किया गया। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 186 और 189 तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धाराओं 110 और 117 के तहत मामला दर्ज किया गया।

    मामला 4 मई 2021 का है। अभियोजन के अनुसार अपीलकर्ता परतवाड़ा स्थित वन क्षेत्र कार्यालय में लेखापाल के पद पर कार्यरत थीं। आरोप था कि वह नशे की हालत में पाई गईं और हंगामा कर रही थीं। इसके बाद पुलिस उन्हें मेडिकल जांच के लिए अचलपुर के उपजिला अस्पताल ले गई।

    अभियोजन का आरोप था कि महिला ने शुरुआत में मेडिकल जांच कराने का विरोध किया और अस्पताल में हंगामा किया। हालांकि बाद में उनके रक्त का नमूना लिया गया और मेडिकल जांच पूरी कर ली गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन के आरोपों को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तब भी लगाए गए अपराधों के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते। कोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर गौर किया कि महिला ने शुरुआत में विरोध करने के बावजूद अंततः मेडिकल जांच कराई।

    पीठ ने कहा,

    "अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए कृत्य को 'किसी सरकारी कर्मचारी को उसके सार्वजनिक कार्य के निर्वहन में स्वेच्छा से बाधा पहुंचाना' नहीं माना जा सकता, जिससे भारतीय दंड संहिता की धारा 186 के तहत अपराध बनता हो। अभियोजन के गवाहों के बयानों से स्पष्ट है कि अपीलकर्ता ने अंततः चिकित्सकीय जांच करा ली थी।"

    कोर्ट ने धारा 189 के तहत लगाए गए आरोप को भी लागू नहीं माना। इस धारा के तहत तब अपराध बनता है जब कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी या उस व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता है, जिसमें सरकारी कर्मचारी की रुचि हो ताकि वह अपने सार्वजनिक कार्य से जुड़ा कोई काम करे न करे या उसमें देरी करे।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों में ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आती जिससे धारा 189 के तहत अपराध बनता हो।

    पीठ ने महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धाराओं 110 और 117 को भी मामले में लागू नहीं माना।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 110 में सड़क, सार्वजनिक स्थान, कार्यालय, थाने या पुलिस चौकी जैसी जगहों पर अशोभनीय भाषा या अव्यवस्थित व्यवहार से संबंधित प्रावधान हैं। वहीं, धारा 112 शांति भंग कराने के इरादे से धमकी देने अपमानजनक या आपत्तिजनक शब्दों अथवा व्यवहार से संबंधित है। धारा 117 इन प्रावधानों के उल्लंघन के लिए सजा का प्रावधान करती है।

    कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह समझना मुश्किल है कि महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की इन धाराओं के तहत भी अपराध कैसे बनता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ का आदेश रद्द किया और आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR निरस्त की।

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